Thursday, November 3, 2022
इमरान खान की हत्या की साज़िश और पाकिस्तान की सेना
Wednesday, October 26, 2022
ऋषि सुनाक के बहाने भारत में हिन्दूविरोध
ऋषि सुनाक का ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनना भारत, भारतवंशियों और विशेषकर हिन्दुओं के लिए ख़ुशी की बात है। वे ब्रिटिश हैं लेकिन अपनी हिन्दू पहचान को लेकर क्षमापार्थी नहीं है। भारत में तो अपनी हिन्दू पहचान को सार्वजनिक रूप से न बताना ही सेकुलरवाद का पर्याय बना दिया गया है। इस कारण कुछ लोगों को पेट में दर्द भी हो रहा है। एक धार्मिक हिन्दू सुनाक के ब्रिटेन सरीखे घोषित ईसाई देश में प्रधानमंत्री बनने को लेकर शशि थरूर और चिदंबरम जैसे कांग्रेस नेताओं ने खुलकर टिप्पड़ी करना भी शुरू कर दिया है कि भारत में ऐसा कब होगा? पंजाबी में एक कहावत है 'कहे बेटी को, सुनावे बहू को।' इन नेताओं की ये टिप्पड़ियाँ कहने को तो भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार के लिए हैं लेकिन ये क्षद्म सेकुलरवादी बयान दरअसल देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं के लिए सुनाने के लिए दिए गए हैं।
ऐसा क्यों हो रहा है? इसे समझना जरूरी है। एक व्यक्तिगत अनुभव इसके मूल में जाने के लिए बताना ठीक रहेगा। हमारे पिताजी दिल्ली में उत्तर रेलवे के मुख्यालय में काम करते थे। पिताजी अपनी धार्मिकता के कारण माथे पर वैष्णवी तिलक लगाते थे और शिखा रखते थे। उन दिनों माहौल ऐसा था कि सार्वजनिक रूप वो भी सरकारी कार्यालय में हमारे पिताजी जैसा कोई इक्का दुक्का ही ऐसा 'साहस' कर पाता था। इसलिए पिताजी का तिलक लगाकर और शिखा बांधकर रोज़ दफ्तर जाना एक असामान्य सी बात मानी जाती थी। तभी क्यों, आज भी आपको ऐसे अनेक लोग मिल जायेंगे जो किसी पूजा के बाद जब दफ्तर या किसी व्यावसयिक मीटिंग में जा रहे होते हैं तो पहले वो तिलक मिटाना नहीं भूलते। ऐसा वे क्यों करते हैं?
यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी है कि तिलक या कोई अन्य धार्मिक चिन्ह धारण करके बाहर निकलना या नहीं निकलना, ये नितांत व्यक्तिगत फैसला है। इसे सही या गलत कहकर हम इसके महत्व को कम या अधिक नहीं करना चाहते। व्यक्तिगत रूप से इस संवेदनशील मामले को यहाँ उद्धृत करने का अभिप्राय सिर्फ इतना भर है कि कैसे कुछ लोगों ने सार्वजनिक स्मृति में इसे सेकुलरवाद का झूठा प्रतीक बनाकर रख दिया है। याद दिलाने की आवश्यकता नहीं कि आज़ादी के फ़ौरन बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने गुजरात में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में लगे अपने मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को उनकी 'हिन्दू पुनर्जागरण' की इस कोशिश के लिए केबिनेट मीटिंग में लताड़ा था। उसके बाद जब 11 मई 1951 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना के लिए जाने का फैसला किया था तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें रोकने की भरसक कोशिश की थी। तर्क था कि सरकारी पदों पर बैठे लोगों को सार्वजनिक रूप से धार्मिक नहीं दिखना चाहिए।
सेकुलरवादियों का ये तर्क मान भी लिया जाये कि धार्मिक पहचानों को सार्वजनिक रूप से दिखाना नैतिक या राजनैतिक रूप से ठीक नहीं तो फिर सुनाक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री बनते ही भारत में 'मुस्लिमपीएम' ये किसने ट्रेंड करवाया? इस ट्रेंड के तले हुई ट्ववीट्स को आप देख लें। सेकुलरवाद के बड़े बड़े झंडाबरदारों के नाम इसमें आपको दिखाई देंगे। क्यों फिर स्कूलों में हिजाब पहनने की पुरजोर वकालत की जाती है? ये दोगलापन नहीं तो और क्या है? कहने का अर्थ ये कि सेकुलरवाद की मोहर का चुनींदा इस्तेमाल आप मज़हब देखकर नहीं कर सकते। आपने ऐसा करके क्या सेकुलरवाद का ये इकतरफा बोझ सिर्फ बहुसंख्यकों के कन्धों पर नहीं लाद दिया? आपने ऐसा नेरेटिव बनाया कि हिंदू आस्था के प्रतीक चिन्ह धारण करने से लोगों को अपराधबोध होने लगा। इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं में अंदर ही अंदर एक रोष पनपता रहा। जब भी उन्होंने इसे प्रकट करने का यत्न किया तो आपने उन्हें साम्प्रदायिक बताकर गाली देना शुरू कर दिया। कुछ लोग आज भी इसीमें लगे हुए हैं।
ऋषि सुनाक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री निर्वाचित होने की घोषणा के तुरंत बाद भारत में इस तरह के बयान इसी झूठे नेरेटिव को आगे बढ़ाते हैं। इस नाते ही ऋषि सुनाक की हिन्दू अस्मिता और उसकी सार्वजनिक पहचान महत्वपूर्ण है। बहुत अच्छा हुआ है कि ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी ने भारतीय मूल के हिन्दू सुनाक को प्रधानमंत्री चुना है। इसके लिए पार्टी और ब्रिटेन की व्यवस्था को बधाई। परन्तु इसकी भारत से तुलना क्यों? इसे लेकर भारतीय व्यवस्था और हिंदू समाज को उलाहना देना हमारे इतिहास, हमारी बहुलतावादी सोच, सर्व समाहक हिन्दू विचार और उसकी सहिष्णुता के साथ घोर अन्याय है। ऐसा कहने वाले पढ़े लिखे तो हैं, पर उनमें समझदारी और इतिहास बोध कम है। या फिर वे मूलतः हीन भावना से ग्रसित हैं। ये अनावश्यक अपराध बोध उनमें आत्मबोध और आत्मविश्वास की कमी को ही दर्शाता है। भारतीय दृष्टि को वे जरा भी समझते तो वे ऐसा नहीं कहते।
भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभाध्यक्ष, मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के जज, सेना प्रमुख, मुख्य सचिव, अनेक राज्यों के राज्यपाल व् मुख्यमंत्री, सेनाध्यक्ष, देश की बड़ी पार्टियों के सर्वेसर्वा तथा चुनाव आयोग के प्रमुख आदि कौनसे पद हैं जो अल्पसंख्यकों में से नहीं बने? क्या हिन्दू समाज को अपना सेकुलरवाद दिखाने के लिए बार बार इनकी सूची बनाकर अपने गले में लटकाकर घूमना होगा ताकि इन कतिपय नेताओं को बताया जा सके कि वे संकीर्ण नहीं हैं? ठीक ही है, सोये आदमी को तो जगाया जा सकता है, परन्तु सोने का अभिनय करने वाले इन आत्ममुग्ध बुद्धिजीवियों को कौन जगा सकता है?
वैसे सुनाक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने हैं तो इससे एक हद तक ही हम खुश हो सकते हैं। उनसे भारत के प्रति किसी विशेष बर्ताव की अपेक्षा रखना खामख्याली ही होगी। बल्कि इससे उल्टा ही होने की संभावना अधिक है। हो सकता है कि वे थोड़े और सजग होकर भारत के प्रति व्यवहार करें ताकि ब्रिटेन जैसे औपचारिक रूप से ईसाई देश में उनकी साख पर कोई बट्टा न लगे। याद रहे कि ब्रिटेन का राजा वहाँ के चर्च का भी प्रमुख है। ब्रिटेन के राजा रानियों का राज्यारोहण एक चर्च यानि वेस्टमिनिस्टर एब्बे में होता है। उन्हें दफनाया भी वहीँ जाता है।
एक भारतवंशी और हिन्दू होने के नाते हमारी प्रधानमंत्री सुनाक से इतनी ही अपेक्षा हो सकती है वे अपने देश ब्रिटेन को उस गहरे आर्थिक संकट से निकालें जिसमें वो फंसा हुआ है। भारत और भारतीयों के प्रति सदाशयता बनायें रखें।
इस पद पर पहुँचने के लिए उन्हें पुनः बधाई !
Friday, September 23, 2022
आर्थिक बदहाली और फौज से तनातनी के बीच गृहयुद्ध की ओर बढता पाकिस्तान
Friday, August 12, 2022
मृग मरीचिका की तलाश में नीतीश!
मृग मरीचिका की तलाश में नीतीश!
राजनीति संभावनाओं का कभी न रुकने वाला खेल हैं। #राजनीति की दाल में जब महत्वाकांक्षाओं का छौंक लगता है तब उसका स्वाद और भी रोचक हो जाता है। इसलिए राजनीति में महत्वाकांक्षा रखना एक बड़ा गुण माना जाता है। मगर इसी दाल में यदि अतृप्त आकाँक्षाओं के नमक का अनुमान गलत हो जाये तो वह अधिक नमकीन होने के कारण ज़हर की तरह कड़वी भी हो जाती है। फलदायी महत्वाकांक्षा और विभ्रम पैदा करने वाली अतृप्त आकांक्षा का सही आकलन और फिर उसका उचित संतुलन ही राजनीति में किसी को सफल और असफल बनाता है।
#बिहार जैसे राज्य के आठवीं बार #मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार ने भाजपा को छोड़कर जो दाव खेला है उसके कारण कल काफी कुछ स्पष्ट हो गए। जब उनसे पूछा गया कि वे क्या खुद को 2024 में #प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार की सम्भावना को देखते हैं, तो उन्होंने पहले तो हाथ जोड़ लिए। उसके बाद फिर पलटकर उन्होंने कहा कि इस बारे में उनके पास कई फोन आये हैं। वे तो बस 2024 में विपक्षी एकता के लिए काम करेंगे। 'विपक्षी एकता के लिए काम करने' के उनके इस कथन में दिल्ली की गद्दी के लिए उनकी अतृप्त आकाँक्षाओं का अनकहा सच छिपा है।
2013 में भाजपा के साथ अपना लम्बा गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश कुमार की ये चौथी राजनीतिक कलाबाज़ी है। पहले भाजपा, फिर 2015 में लालू यादव के राजद, 2017 में फिर भाजपा और अब फिर लालू की पार्टी और कॉंग्रेस के साथ जो राजनीतिक शादी रचाई है वह सिर्फ पटना की गद्दी के लिए नहीं हैं। 2014 से ही कई पत्रकार और विश्लेषक उन्हें प्रधानमंत्री पद के सबसे उपयुक्त राजनेता के रूप में प्रस्तुत करते आये हैं। उन्हें इस तरह पेश करने वाले उनके कितने शुभचिंतक है ये तो वक्त ही बताएगा। इससे लेकिन अब लगता है कि खुद नीतीश के सोये सपनों को पंख लग गए हैं। इसीलिये वे अपनी भरी दावत से उठकर पड़ोस के घर में बारात लेकर पहुँच गए हैं। मगर उनके ये अरमान वास्तविकताओं से बहुत दूर लगते हैं।
विपक्षी एकता का जो परचम वे थामने के लिए निकले हैं उसके बहुत से दावेदार पहले से ही मौजूद हैं। जो विपक्षी राजनीतिक दल राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव तक में एक नहीं हो पाए वो 2024 के आम चुनाव में नीतीश के नेतृत्व तले एकजुट हो जायेंगे वो मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा ख्याल ही है। अगर ऐसा है तो फिर ममता बनर्जी का क्या होगा? चन्द्रशेखर राव क्या करेंगे? कांग्रेस पटना में नीतीश की ताजपोशी में तो बैंड बाजा लेकर गाने गाकर नाच सकती है। लेकिन दिल्ली दरबार के लिए तो पार्टी के एकमात्र युवराज राहुल गाँधी ही हो सकते हैं।
संत कबीर का एक दोहा है:
माया मरी न मन मरा, मर मर गये शरीर।
आषा तृष्णा ना मरी, कह गये दास कबीर।।
इस दोहे का अर्थ है कि मनुष्य का मन बड़ा छलिया होता है। वह आदमी की अतृप्त आकाँक्षाओं और सुप्त कामनाओं को लगातार छेड़ता रहता है। इस दौरान उसकी बुद्धि भी उसके बस में नहीं रहती। माया का ये खेल आदमी से जो न करा दे सो कम है। विवेकशील लोग इसलिए हमेशा ही इस ठगिनी माया से सतर्क ही बने रहते हैं। पर कुर्सियों पर बैठे सत्ता के मद में रहते हुए विवेक की रक्षा कर पाना बहुत ही मुश्किल काम हैं । लगता है राजनीति की इस मोहिनी ने एक बार फिर नीतीश कुमार पर अपना जादू चला दिया है।
यानि लालकिले की प्राचीर से झंडा फहराने का मोह एक बार फिर #नीतीश कुमार के पाला बदलने के पीछे की बड़ी वजह है। अन्यथा उन जैसा कुशल और चतुर राजनेता और मंझा हुआ खिलाडी इस समय राष्ट्रीय जनता दल और #कांग्रेस की झोली में जाकर नहीं बैठता। उनकी सरकार ठीकठाक ही चल रही थी। #भाजपा से कोई ऐसा मतभेद भी नहीं था जो दूर न हो सके। उनके नेतृत्व को भी कोई चुनौती नहीं थी। वे मोह के इस जाल में #राजनीति के तपते रेगिस्तान में पानी का आभास देती उन वायुतरंगों के फेर में पड़ गए हैं जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है।
#नीतीशकुमार ऐसे राजनेता हैं जिनकी हर पक्ष में अब तक इज़्ज़त रही है। पर इस मृग मरीचिका के चक्कर में कहीं ऐसा न हो कि उनकी स्थिति तृष्णा में दोनों गए, 'माया मिली न राम जैसी हो जाये'।
Tuesday, July 26, 2022
महज राजनीतिक संकेतवाद नहीं है द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति होना
अच्छा होता कि वनवासी समाज की पहली बेटी जब देश के प्रथम नागरिक के तौर पर देश के सर्वोच्च पद पर बैठी तो ये बिना चुनाव के होता। पर संभवतः विपक्ष के नेताओं का व्यर्थ का अहंकार और हर कीमत पर मोदी के विरोध ने उनकी आँखों पर एक पट्टी बांध दी है। अन्यथा वे एक बनावटी वैचारिक संघर्ष के तर्क के आधार पर यशवंत सिन्हा को इस चुनाव में खड़ा नहीं करते।
श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के चुनाव को लेकिन सिर्फ एक राजनीतिक संकेतवाद मानना उन भागीरथ प्रयासों की अनदेखी करना होगा जो पिछले कई दशकों से देश के अनुसूचित जनजातीय इलाकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषंगी संगठन चला रहे हैं। ये देखना हो तो वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा सुदूर क्षेत्रों में बालकों और बालिकाओं के लिए चलाये जा रहे सैंकड़ों छात्रावासों में से किसी में जाइये। नहीं तो किसी एकल विद्यालय में हो होकर आइये। मैं स्वयं मणिपुर में वनवासी कल्याण आश्रम के एक हॉस्टल में कुछ दिन सपरिवार रहा। भाषा की दिक्कत होने के बावजूद उन बच्चियों के साथ मेरी बेटी दीक्षा और पत्नी सीमा का अपनेपन का एक सहज और निर्मल नाता जुड़ गया। कुछ साल बाद उनमें से भी कोई बच्ची किसी जिम्मेदारी को संभालेगी तो वह राजनीतिक संकेत मात्र नहीं होगा।
इस परिवर्तन को एक तरह अपनों का लम्बे समय बाद मिलना या सम्मिलन कहा जा सकता है। हम ही अपने वनवासी भाई बहनों से अलग हो गए थे अथवा हमें दूर कर दिया गया था। परिवर्तन की एक व्यापक लेकिन निश्चित लहर ऊपर के अराजनीतिक उद्वेलन के बरक्स समाज रुपी नदी के गंभीर आँचल में बह रही है। श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जमीनी स्तर पर चल रही इस व्यापक क्रांति की प्रतीक हैं। वे भारत की उस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से निकली हैं जिसकी जड़ें देश की सांस्कृतिक विरासत में हैं। दिखने में विविध होते हुए भी यह धारा एकात्म ही है। एक अध्यापिका से पार्षद, उड़ीसा में मंत्री, झारखण्ड में राज्यपाल और अब देश की राष्ट्रपति - परत दर परत और कदम दर कदम उन्होंने एक लम्बी और संघर्षपूर्ण यात्रा तय की है। जो पद और सम्मान उन्हें मिला है वे उसकी बराबरी की हकदार हैं।
देश का वनवासी समाज इस देश के बृहत् समाज का ही अभिन्न अंग है। वह भी देश की शताब्दियों से चली आ रही विरासत की अविरल धारा का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है जितना कि मुंबई अथवा दिल्ली जैसे बड़े और आधुनिक शहरों में रहने वाला कोई नागरिक। यह सोच आदिवासी नाम देकर समाज के किसी हिस्से को पिछड़ा अथवा असंस्कृत नहीं घोषित करती। उन्हें कथित मुख्यधारा में जोड़ने के नाम पर उन्हें अपनी जड़ों से अलग करने का गोरखधंधा नहीं करती। इस सोच के अनुसार भारतीय समाज का एक हिस्सा वनों में रहता रहा है और एक हिस्सा शहरों और गांवों में। लेकिन समाज मूल रूप से एक ही है।
अंग्रेज़ों के आने के बाद इन वनवासियों को असंस्कृत घोषित कर उनका धर्म और रहन सहन बदलने का सुनियोजित षड्यंत्र किया गया जो आज भी बदस्तूर जारी है। उनको भारत और अन्य भारतीयों से अलग दिखाने के लिए कभी उन्हें मूल निवासी और कभी आदिवासी कहा गया। इसी आधार पर बड़े पैमाने पर उनका धर्म परिवर्तन किया गया।
सैमुअल पी हंटिंगटन 'सभ्यताओं के संघर्ष' नाम की अपनी पुस्तक मे पिछड़े समाजों को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि ऐसा समाज वो है - 1) जो पढ़ा लिखा नहीं है, 2) जिसका शहरीकरण नहीं हुआ है और जो, 3) एक जगह पर स्थापित नहीं है। ऐसा हर समाज इस पाश्चात्य अवधारणा के अनुसार 'आदिम' और 'असभ्य' है। इस आदिम और असभ्य समाज को सभ्यता सिखाने के नाम पर उसका नरसंहार, उत्पीड़न और मतांतरण बड़े पैमाने पर दुनिया में किया गया। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में तो लाखों 'इंडियन' और वहाँ रहने वाले 'एबोरीजन्स, यानि मूलवासियों को मार ही डाला गया। वनवासियों को इस निगाह से देखने का ये नजरिया पाश्चात्य दर्शन की देन है। हैरत की बात है कि इस तरह की सोच रखने वाले आज हमें मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रताओं पर भाषण देते हैं। अफ़सोस, अपने ही देश के बुद्धिजीवी वर्ग का एक हिस्सा ऐसे लोगों की इन भेदभावपूर्ण और सिरे से नस्लगत बातों पर तालियाँ पीटता है।
भारत की सोच यह नहीं है। पौराणिक काल से लेकर गांधीजी तक और गुरु गोलवलकर से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक वनवासी समाज को अपना ही अभिन्न हिस्सा मानते हैं। रहने का स्थान जंगल में होने के कारण कोई भिन्न कैसे हो सकता है? कहने का ये अर्थ कदापि नहीं कि वनवासी समाज की अनदेखी नहीं हुई। इस समाज के साथ कतिपय कारणों से भेदभाव हुआ। ये सही है कि दूरस्थ इलाकों में रहने के काऱण समाज का ये हिस्सा आज की शिक्षा और अन्य विकासमूलक गतिविधियों में पिछड़ गया। इसके लिए संविधान में अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग प्रावधान किये गए। जो बिलकुल उचित ही हैं।
ये देखते हुए राष्ट्रपति मुर्मू का पहला भाषण बहुत ही प्रेरणादायक और उत्साहित करने वाला था। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नायकों के साथ रानी चेन्नमा और रानी गाइडिल्यू तथा संथाल, भील और कोल क्रांति को भी स्मरण किया। वे लगातार राष्ट्रपति पद के दायित्व बोध की बात करतीं रहीं। वे संयम, शालीनता, स्वाभिमान और स्वचेष्टा से परिपूर्ण रहीं। लगातार उन्होंने भारत की अविछिन्न लोकतान्त्रिक परम्परा और अविरल बहती सांस्कृतिक धारा का उल्लेख अपने भाषण में किया। उन्हें देखकर लगा कि वे राष्ट्रपति भवन का मान और मर्यादा दोनों ही बढ़ायेंगी।
उनके राष्ट्रपति बनने पर समूचे भारत को बधाई!
पुरातन काल से अविछिन्न उसकी लोकतान्त्रिक विरासत को बधाई।
उसके जनजातीय समाज को बधाई।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी भारत की प्राचीनतम समय से चली आ रही अविरल सांस्कृतिक धारा की प्रतीक हैं।
हम सबको बधाई क्योंकि हम भी उसी महान विरासत की एक कड़ी हैं।








