Tuesday, July 26, 2022

महज राजनीतिक संकेतवाद नहीं है द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति होना

राजनीति और समाज जीवन में संकेतों की अपनी जगह होती है। बड़े लक्ष्य के लिए यदि संकेत के तौर पर किसी को कोई पद दिया जाये तो इसमें कोई बुराई भी नहीं हैं। पंजाब में आतंकवाद की पृष्ठभूमि में जब ज्ञानी जैलसिंह 1982 में देश के सातवें #राष्ट्रपति बने थे तो यह भी राजनीतिक संकेत ही था। उस समय ज्ञानी जी सर्वानुमति से राष्ट्रपति चुने गए थे। तब का विपक्ष इंदिरा जी का धुर विरोधी था। पक्ष और विपक्ष एक दूसरे को फूटी आँखों नहीं सुहाते थे लेकिन आज के विपक्ष की तरह एक 'छद्म वैचारिक संघर्ष' के नाम पर ज्ञानी जी के नाम का विरोध  तब के विपक्ष ने नहीं किया था। 


अच्छा होता कि वनवासी समाज की पहली बेटी जब देश के प्रथम नागरिक के तौर पर देश के सर्वोच्च पद पर बैठी तो ये बिना चुनाव के होता। पर संभवतः विपक्ष के नेताओं का व्यर्थ का अहंकार और हर कीमत पर मोदी के विरोध ने उनकी आँखों पर एक पट्टी बांध दी है। अन्यथा वे एक बनावटी वैचारिक संघर्ष के तर्क के आधार पर यशवंत सिन्हा को इस चुनाव में खड़ा नहीं करते। 


श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के चुनाव को लेकिन सिर्फ एक राजनीतिक संकेतवाद मानना उन भागीरथ प्रयासों की अनदेखी करना होगा जो पिछले कई दशकों से देश के अनुसूचित जनजातीय इलाकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषंगी संगठन चला रहे हैं। ये देखना हो तो वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा सुदूर क्षेत्रों में बालकों और बालिकाओं के लिए चलाये जा रहे सैंकड़ों छात्रावासों में से किसी में जाइये। नहीं तो किसी एकल विद्यालय में हो होकर आइये। मैं स्वयं मणिपुर में वनवासी कल्याण आश्रम के एक हॉस्टल में कुछ दिन सपरिवार रहा। भाषा की दिक्कत होने के बावजूद उन बच्चियों के साथ मेरी बेटी दीक्षा और पत्नी सीमा का अपनेपन का एक सहज और निर्मल नाता जुड़ गया। कुछ साल बाद उनमें से भी कोई बच्ची किसी जिम्मेदारी को संभालेगी तो वह राजनीतिक संकेत मात्र नहीं होगा।  


इस परिवर्तन को एक तरह अपनों का लम्बे समय बाद मिलना या सम्मिलन कहा जा सकता है। हम ही अपने वनवासी भाई बहनों से अलग हो गए थे अथवा हमें दूर कर दिया गया था। परिवर्तन की एक व्यापक लेकिन निश्चित लहर ऊपर के अराजनीतिक उद्वेलन के बरक्स समाज रुपी नदी के गंभीर आँचल में बह रही है। श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जमीनी स्तर पर चल रही इस व्यापक क्रांति की प्रतीक हैं। वे भारत की उस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से निकली हैं जिसकी जड़ें देश की सांस्कृतिक विरासत में हैं। दिखने में विविध होते हुए भी यह धारा एकात्म ही है। एक अध्यापिका से पार्षद, उड़ीसा में मंत्री, झारखण्ड में राज्यपाल और अब देश की राष्ट्रपति - परत दर परत और कदम दर कदम उन्होंने एक लम्बी और संघर्षपूर्ण यात्रा तय की है। जो पद और सम्मान उन्हें मिला है वे उसकी बराबरी की हकदार हैं। 


देश का वनवासी समाज इस देश के बृहत् समाज का ही अभिन्न अंग है। वह भी देश की शताब्दियों से चली आ रही विरासत की अविरल धारा का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है जितना कि मुंबई अथवा दिल्ली जैसे बड़े और आधुनिक शहरों में रहने वाला कोई नागरिक। यह सोच आदिवासी नाम देकर समाज के किसी हिस्से को पिछड़ा अथवा असंस्कृत नहीं घोषित करती। उन्हें कथित मुख्यधारा में जोड़ने के नाम पर उन्हें अपनी जड़ों से अलग करने का गोरखधंधा नहीं करती। इस सोच के अनुसार भारतीय समाज का एक हिस्सा वनों में रहता रहा है और एक हिस्सा शहरों और गांवों में। लेकिन समाज मूल रूप से एक ही है। 


अंग्रेज़ों के आने के बाद इन वनवासियों को असंस्कृत घोषित कर उनका धर्म और रहन सहन बदलने का सुनियोजित षड्यंत्र किया गया जो आज भी बदस्तूर जारी है। उनको भारत और अन्य भारतीयों से अलग दिखाने के लिए कभी उन्हें मूल निवासी और कभी आदिवासी कहा गया। इसी आधार पर बड़े पैमाने पर उनका धर्म परिवर्तन किया गया। 


सैमुअल पी हंटिंगटन 'सभ्यताओं के संघर्ष' नाम की अपनी पुस्तक मे पिछड़े समाजों को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि ऐसा समाज वो है - 1) जो पढ़ा लिखा नहीं है, 2) जिसका शहरीकरण नहीं हुआ है और जो,  3) एक जगह पर स्थापित नहीं है। ऐसा हर समाज इस पाश्चात्य अवधारणा के अनुसार 'आदिम' और 'असभ्य' है। इस आदिम और असभ्य समाज को सभ्यता सिखाने के नाम पर उसका नरसंहार, उत्पीड़न और मतांतरण बड़े पैमाने पर दुनिया में किया गया। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में तो लाखों 'इंडियन' और वहाँ रहने वाले 'एबोरीजन्स, यानि मूलवासियों  को मार ही डाला गया। वनवासियों को इस निगाह से देखने का ये नजरिया पाश्चात्य दर्शन की देन है। हैरत की बात है कि इस तरह की सोच रखने वाले आज हमें मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रताओं पर भाषण देते हैं। अफ़सोस, अपने ही देश के बुद्धिजीवी वर्ग का एक हिस्सा ऐसे लोगों की  इन भेदभावपूर्ण और सिरे से नस्लगत बातों पर तालियाँ पीटता है। 


भारत की सोच यह नहीं है। पौराणिक काल से लेकर गांधीजी तक और गुरु गोलवलकर से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक वनवासी समाज को अपना ही अभिन्न हिस्सा मानते हैं।  रहने का स्थान जंगल में होने के कारण कोई भिन्न कैसे हो सकता है? कहने का ये अर्थ कदापि नहीं कि वनवासी समाज की अनदेखी नहीं हुई। इस समाज के साथ कतिपय कारणों से भेदभाव हुआ। ये सही है कि दूरस्थ इलाकों में रहने के काऱण समाज का ये हिस्सा आज की शिक्षा और अन्य विकासमूलक गतिविधियों में पिछड़ गया। इसके लिए संविधान में अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग प्रावधान किये गए। जो बिलकुल उचित ही हैं। 


ये देखते हुए राष्ट्रपति मुर्मू का पहला भाषण बहुत ही प्रेरणादायक और उत्साहित करने वाला था। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नायकों के साथ रानी चेन्नमा और रानी गाइडिल्यू तथा संथाल, भील और कोल क्रांति को भी स्मरण किया। वे लगातार राष्ट्रपति पद के दायित्व बोध की बात करतीं रहीं। वे संयम, शालीनता, स्वाभिमान और स्वचेष्टा से परिपूर्ण रहीं। लगातार उन्होंने भारत की अविछिन्न लोकतान्त्रिक परम्परा और अविरल बहती सांस्कृतिक धारा का उल्लेख अपने भाषण में किया। उन्हें देखकर लगा कि वे राष्ट्रपति भवन का मान और मर्यादा दोनों ही बढ़ायेंगी। 


उनके राष्ट्रपति बनने पर समूचे भारत को बधाई!

पुरातन काल से अविछिन्न उसकी लोकतान्त्रिक विरासत को बधाई। 

उसके जनजातीय समाज को बधाई। 

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी भारत की प्राचीनतम समय से चली आ रही अविरल सांस्कृतिक धारा की प्रतीक हैं। 

हम सबको बधाई क्योंकि हम भी उसी महान विरासत की एक कड़ी हैं।


Sunday, July 24, 2022

200 करोड़ टीकों के मायने


#200 करोड़ टीकों के मायने 
बचपन में पिताजी की कही एक बात आज याद आयी। उन्होंने कहा था कि आवश्यक बातों के फेर में अक्सर हम महत्वपूर्ण बातें भूल जाते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि हम बार बार ये याद करते रहें कि हमारे लिए महत्वपूर्ण क्या है। इसी बात को यदि ख़बरों के सन्दर्भ में देखा जाए तो हमारे आसपास जो तुरंत की घटनाएं हो रहीं होती हैं वे हमें इतनी घेर लेतीं हैं कि हम उन समाचारों की अनदेखी कर देते हैं जो हमारे लिए उनसे कहीं अधिक महत्व की होतीं हैं। 

इन दिनों ख़बरों की सुर्ख़ियों में राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति के चुनाव, महाराष्ट्र का घटनाक्रम, मानसून की बारिश, देश के कई राज्यों में बाढ़, संसद का मानसून सत्र तथा रूस-उक्रेन युद्ध आदि प्रमुखता से छाए हुए हैं। इस बीच ये खबर कहीं दब कर रह गई कि देश ने 17 जुलाई को 200 करोड़ कोरोना टीके लगाने का आंकड़ा छू लिया। शायद सबने इसे ये कहकर सामान्य सी घटना मान लिया कि 'ये तो होना ही था।' देश की इस बड़ी उपलब्धि की चर्चा महत्वपूर्ण होने के साथ साथ आवश्यक भी है। 

याद कीजिये कोरोना की पहली और दूसरी लहर को। जब लाखों लोग खौफजदा होकर पैदल अपने गावों के लिए निकल पड़े थे। जब अस्पताल में बिस्तर कम पड़ गए थे। बिस्तर मिल गया तो लोग ऑक्सीजन की जद्दोजहद से जूझ रहे थे। देश का कोई ही परिवार शायद ऐसा होगा जिस पर किसी न किसी तरह कोरोना की महामारी का असर न पड़ा हो। असलियत तो ये है कि उन दिनों जब किसी के भी फोन की घंटी बजती थी तो बस मन अनिष्ट की आशंका से भर जाता था। ये कोई दूर की बात नहीं बस 18 से 20 महीनों के भीतर ही हम सबके साथ गुजरा है। 

मौजूदा ख़बरों के शोर में यदि ये सब आप भूल गए हैं तो कुछ तथ्यों पर गौर करने की ज़रुरत है। कोरोना की महामारी अभी गयी नहीं हैं।  पिछले एक हफ्ते में दुनिया भर में कोरोना के 64 लाख से ज़्यादा नए मामले दर्ज हुए है।  फ़्रांस में 9 लाख 14 हज़ार,  अमेरिका में 8 लाख 17 हजार, जर्मनी में 6 लाख 30 हजार, इटली में 6 लाख 71 हजार, जापान में 2 लाख 69 हजार और ऑस्ट्रलिया में 2 लाख 63 हजार से ज्यादा नए मरीज एक हफ्ते में निकले हैं। भारत में इनके मुकाबले हफ्ते भर में कोई 1 लाख 20 हजार मामले ही आये। ये सभी देश भारत से कहीं अधिक विकसित हैं और इनकी जनसँख्या तो अपने देश से बहुत ही कम है।  

उधर चीन में पिछले दो महीने से अधिक समय से कोरोना को लेकर त्राहि त्राहि मची हुई है। शंघाई और बीजिंग जैसे शहरों को बार बार बंद करना पड़ा है। दुखी लोग कई बार सड़कों पर भी निकले हैं। चीन से सही खबरें और आंकड़े आना तो असम्भव ही है। लेकिन कुल मिलाकर कहा जा सकता है वहां से जो भी छन छन कर खबरें मिल रहीं हैं उनके अनुसार 'ज़ीरो कोविड' की नीति पर चलने वाला चीन कोरोना के नियंत्रण में बुरी तरह असफल रहा है। वहां लोगों की स्थिति ठीक नहीं हैं। 

एक और आँकड़ा देश की कोरोना के खिलाफ अभूतपूर्व लड़ाई को और अच्छी तरह रेखांकित करता हैं। कोरोना से हुई मौतों की दर भारत में दुनिया के औसत से कोई एक तिहाई के आसपास ही है। विश्व में प्रति 10 लाख जनसँख्या पर 819 लोगों ने कोरोना से जान गवाई है। भारत में प्रति दस लाख पर ये संख्या 373 है। अगर अन्य देशों को देखा जाये तो फ़्रांस में 10 लाख लोगों पर 2296, जर्मनी में 1690, ब्रिटेन में 2646, रूस में 2615, इटली में 2819 और स्पेन में 2373 लोगों की मौत कोरोना से हुई है। ये सब अमीर देश हैं और इनकी स्वास्थ्य व्यवस्था हमेशा अच्छी बताई जाती रही है। 

और तो और जैसे देश में भी कोरोना से मरने वालों की कुल संख्या अमेरिका में 10 लाख 48 हजार से ज्यादा रही है। अमेरिका की जनसँख्या 33 करोड़ के आसपास है। इसके बनिस्बत भारत में 140 करोड़ की जनसँख्या पर कोरोना से हुई मौतों की संख्या अब तक 5 लाख 25 हजार दर्ज की गई है। यों तो एक भी मौत दुखद है परन्तु आप अगर तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो कोरोना से संघर्ष में हम लोगों ने दुनिया के मुकाबले कहीं बेहतर काम किया है। 

200 करोड़ टीके लगने का आँकड़ा अभी भी जारी कोरोना के साथ लड़ाई में मील का एक बड़ा पत्थर है। इसके लिए हम सबको अपनी पीठ थपथपाने की ज़रुरत है। देश के वैज्ञानिक, टीका विकसित करने और बनाने वाली प्राइवेट कम्पनियाँ, डॉकटर, अन्य चिकित्साकर्मी, आरोग्य सेतु/अन्य ऐप बनाने और चलाने वाले आई टी कर्मी, राज्यों और केंद्र सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है। बधाई का पात्र है नरेंद्र मोदी की अगुआई में देश का नेतृत्व जिसने तमाम विवादों और आशंकाओं के बीच अपने निश्चय को डिगने नहीं दिया।  

कुल मिलाकर ये सफलता है भारत के सजग समाज की, जिसने बिना हिचक दिखाए 18 महीने के भीतर इतनी तत्परता से कोरोना के देशनिर्मित टीके लगवाए। जिन पढ़े लिखे और अमीर देशों का उल्लेख हमने ऊपर किया है उनमें से कई अभी तक 'वैक्सीन हैजिटेन्सी' यानि टीका लगवाने में संकोच की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। और कुल मिलाकर कर इसका खामियाजा भी भुगत रहे है। 

शाबाश भारत !

Wednesday, June 29, 2022

महाराष्ट्र : हिन्दू विरोध की राजनीति और शिंदे का विद्रोह








राज्य में शिवसेना के नेतृत्व में बनी महाराष्ट विकास अघाड़ी की उद्धव सरकार का बचना अब तकरीबन असंभव है। नयी सरकार किसकी होगी और कौन इसका मुखिया होगा फिलहाल इसके सिर्फ अनुमान लगाए जा सकते हैं। मगर महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में जो उखाड़-पछाड हो रही है, उसका असर वे यहीं तक सीमित नहीं रहेगा। उसके परिणाम भारतीय राजनीति पर दूर तक पड़ेंगे। 

देखा जाये तो ये देश में उभरी नई राजनीतिक वास्तविकता का परिणाम है। स्वतंत्र भारत में पहला मौका है जब ताल ठोक कर ये कहकर एक सरकार को गिराया जा रहा है कि वह हिन्दू विरोधी है। शिवसेना से विद्रोह करने वाले एकनाथ शिंदे ने उद्धव की अघाड़ी सरकार को साफ़ साफ 'हिन्दू विरोधी' कहा है। यही शिवसेना से बाहर आने का उनका मूल तर्क भी है। नहीं तो इतने नेताओं का शिवसेना जैसी पार्टी में एकसाथ होकर नेतृत्व को खुली चुनौती देना एक तिलिस्म जैसा ही लगता है। अगर जमीनी हकीकत बदली नहीं होती तो गठजोड़ों की राजनीति के उस्ताद शरद पवार के नेतृत्व वाले एमवीए को ऐसे ललकारना कोई आसान बात नहीं थी। 

ये बात सही है कि राजनीति में सब कुछ सीधा सीधा नहीं होता इसलिए शिवसेना से अलग होने के कई और भी कारण ज़रूर हैं। मगर अघाड़ी का सरकार का 'हिन्दू विरोधी' चरित्र वह धागा है जो इतने शिवसेना विधायकों और मंत्रियों को एकसाथ जोड़ रहा है।  इससे पहले छगन भुजबल और नारायण राणे जैसे नेता भी सेना से अलग हुए थे। लेकिन वह कुछेक नेताओं का ही पार्टी से अलग होना था। अबकी बार तो जनता के वोट से चुने तकरीबन सभी बड़े नेता अगर शिवसेना से अलग हो रहे हैं तो बात कुछ गहरी है। 

ये सब शिवसेना के उस बीज की उपज है जो प्रखर और व्यक्त रूप से हिन्दू हितों की बात करता रहा है। बाल ठाकरे का स्पष्ट हिंदुत्व इनके ही नहीं बल्कि उस जनता के भी डीएनए में जिसने इन्हें चुना है। ये समझते हैं कि उद्धव सरकार के मौजूदा रवैये को जिसे ये हिन्दू विरोधी मानते हैं, लेकर वे जनता के बीच नहीं जा सकते। ये सही है कि  राजनीति में लोग पाला और दिशा दोनों बदलते है। लेकिन सौ की रफ़्तार से तेज़ी से दौड़ता हुआ व्यक्ति यदि अचानक पलटे तो वह धड़ाम से गिर ही जायेगा। ऐसी रफ़्तार में मुड़ने से पहले गति कम करनी होती है और एक अर्धकार गोल चक्कर लगाना पड़ता है। इन खाँटी शिवसैनिकों के लिए आक्रामक हिंदुत्व छोड़कर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करना कुछ ऐसे ही हो गया था। 

ये कैसे अपने वोटरों और जमीन पर काम करने वाले शिवसैनिकों को समझा पाएंगे कि हनुमान चालीसा पढ़ने के 'जुर्म' में एक सांसद और उनके विधायक पति को इनकी सरकार ने जेल भेजा? ये उन्हें कैसे बताएँगे कि एक सोशल मीडिया पोस्ट साझा करने के लिए अभिनेत्री केतकी चिताले को एक महीने से अधिक जेल में क्यों रहना पड़ा?  क्योंकर पालघर में दो साधुओं और उनके चालक की भीड़ ने सरे आम  पीट पीट कर हत्या कर दी और बालासाहब के पुत्र के नेतृत्व में चल रही सरकार बस दाएं बाएं करती रही? इन विधायकों को लगता है कि इस तरह उनका दोबारा चुनना ही मुश्किल नहीं होगा, बल्कि उनकी अब तक जमा की हुई सारी राजनीतिक जमापूँजी सिर्फ इस 'यू टर्न' को समझाते समझाते हवा में फुर्र हो जाएगी।

अब तक कथित 'साम्प्रदायिकता' का सवाल जिसे मूलतः हिन्दू विरोध के रूप में देखा जा सकता है, भारतीय राजनीति के कई गठजोड़ों की जड़ में रहा है। पर ये पहली बार हो रहा है जब हिन्दू हितों के समर्थन में  महाराष्ट्र जैसे बड़े और महत्वपूर्ण राज्य में एक सरकार गिरने की कगार पर है। अल्पसंख्यकवाद की राजनीति का सिक्का देश में खूब चलता रहा है। लेकिन ये सिक्का अब खोटा हो चला है। महाराष्ट्र का घटनाक्रम इसकी पुष्टि कर रहा है। 

अल्पसंख्यकों को भावनात्मक मुद्दों पर भड़का कर राजनीति कोई नयी बात नहीं हैं। 1979 में जब चौधरी चरणसिंह और समाजवादियों ने मिलकर जनता पार्टी तोड़ी थी तो उन्होंने दोहरी सदस्यता को मुद्दा बनाया था। याद रहे कि 1977 में विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी बनाई थी। जनता पार्टी में तत्कालीन भारतीय जनसंघ (जो अब भारतीय जनता पार्टी है) भी शामिल था। समाजवादियों ने ये कहकर पार्टी तोड़ी थी कि जनसंघ के सदस्य पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों से जुड़े नहीं रह सकते। इसका सीधा साधा मतलब था कि आप अन्य सामाजिक सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े रह सकते है लेकिन हिन्दू हितों की बात करने वाले संघ से सम्बन्ध नहीं रख सकते। 

जनता पार्टी उस आपत्काल की देन थी जिसकी बरसी गए 25 जून को देश ने मनाई । हर साँस में मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले दल, एन जी ओ, एक्टिविस्ट और सोशल मीडिया वीर कॉंग्रेस द्वारा देश पर थोपे इस काले अध्याय पर चुप ही रह जाते हैं। और तो और पालघर के साधुओं की हत्या में उन्हें 'लिंचिंग' नजर नहीं आती। जुबैर की गिरफ्तारी उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटने जैसी लगती है पर केतकी के जेल में रहने को वे एक सामान्य घटना मानते हैं। सवाल अब दोहरी सदस्यता का नहीं बल्कि इन दोहरे मानदंडों का बन गया है। 

इस लिहाज से महाराष्ट्र की घटनाएं और उत्तर प्रदेश के आजमग़ढ और रामपुर लोकसभा उपचुनावों के नतीजे एक नए जमीनी रुख और राजनीतिक वास्तविकता की और इशारा करते हैं। रामपुर में 50% से अधिक आबादी मुसलमानों की है तो आज़मगढ़ में 40% से अधिक मुस्लिम यादव जनसँख्या है। इन दोनों सीटों को अल्पसंख्यक लामबंदी और मुस्लिम यादव गठजोड़ के कारण समाजवादी पार्टी की बपौती माना जाता रहा है। लेकिन उपचुनाव के नतीजे अब नई कहानी कह रहे हैं। ये कहानी है कि चाहे वह उत्तरप्रदेश हो या फिर महाराष्ट्र, मुस्लिम तुष्टिकरण और जातिगत समीकरण की राजनीति एक नए तरह के ज़मीनी ध्रुवीकरण को जन्म दे रही है। 

बनावटी, क्षद्म और सुविधा के अनुसार ओढी गयी एकतरफा सेकुलरवाद की चादर अब सिर्फ मैली ही नहीं बल्कि तार तार हो गयी हैं। हिन्दू हितों की बात करने वालों को साम्प्रदायिक बताकर अल्पसंख्यक वोट बटोरने का राजनीतिक खेल अब उलटे राजनीतिक और चुनावी परिणाम दे रहा है। इस मायने में एकनाथ शिंदे के विद्रोह ने एक नयी राजनीतिक इबारत लिख दी है। इस नये राजनीतिक यथार्थ को जो दल झुठलायेगा वह राजनीतिक इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जायेगा। एक तरह से शिंदे और उनके साथियों ने हिन्दू विरोध की राजनीति के ताबूत में एक मोटी कील ठोक दी है।

Thursday, May 5, 2022

द कन्वर्जन : लवजिहाद पर एक सशक्त फिल्म



 

द कन्वर्जन : लवजिहाद पर एक सशक्त फिल्म 

सीमा की नज़र बार बार अपने मोबाइल की डिजिटल घड़ी पर जा रही थी। नौ बजने को आये थे पर फिल्म अभी तक शुरू नहीं हुई थी। उसे चिंता थी कि फिल्म लम्बी चली तो खाना मिल पायेगा कि नहीं। पिछली बार हम जब कश्मीर फाइल्स का पहले दिन का शो देखने गए थे तब भी देर रात होने से सारे रेस्टोरेंट बंद हो चुके थे। खाना उसदिन भी नहीं मिला था। कल यानि बृहस्पतिवार की रात तो हम दिल्ली के चाणक्य सिनेमा में 'द कन्वर्जन' का ग्रेंड प्रीमियर देखने के लिए आये थे। प्रीमियर का घोषित समय था सात बजे का। मैंने मुझे बड़े आदर भाव से निमंत्रित करने वाले मित्र कपिल मिश्रा से पूछा भी था तो उन्होंने कहा था कि आप 7.25 तक आएंगे तो चलेगा। इसलिए मेरा अनुमान था कि कुल मिलाकर 7.45 तक तो पिक्चर शुरू हो ही जाएगी। ढाई घंटे की लम्बी फिल्म हुई तो भी साढ़े दस तक तो हम फारिग हो जायेंगे। लेकिन यहाँ तो नौ बज चुके थे और फिल्म शुरू होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक दो बार बीच में कभी वीडियो तो कभी आवाज़ आती थी पर फिर गायब हो जाती थी। 

बार बार कुछ तकनीकी गड़बड़ी की घोषणओं के बीच खचाखच भरे ऑडी 3 में दर्शक धैर्य और उत्कंठा से फिल्म शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे। मेरा पत्रकारीय मन किसी गड़बड़ी या अनिष्ट की आशंका भी कर रहा था। मुझे ध्यान आ रहा था कि अभूतपूर्व सफलता पाने वाली कश्मीर फाइल्स को भी शुरू के दिनों में कुछ थियेटरों में दिक्क्तों का सामना करना पड़ा था। दूर क्यों जाया जाये, पिछले हफ्ते ही राजधानी के फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट क्लब और फिर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने कश्मीर फाइल्स के सफल निर्देशक विवेक अग्निहोत्री को प्रेस वार्ता करने की इजाज़त नहीं दी थी। 'द कन्वर्जन' तो सीधे सीधे एक बेहद विवादित मगर ज्वलंत मुद्दे पर बनी फिल्म है। न जाने दिनरात 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की वकालत करने वालों में से किसी को 'सलेक्टिव सेकुलरवाद' का कौन सा कीड़ा काट जाये और फिल्म का प्रदर्शन ही रोक दिया जाये। 

ऐसे कई सवाल मन में उस भूख की तरह बिलबिला रहे थे जो हमारे पेट में भी हलचल मचा रही थी। इतनी भीड़ में उठकर कुछ खाने के लिए जाना भी अटपटा लग रहा था। मगर तकनीकी गड़बड़ से भूख थोड़े ही रुकती है सो कई लोग बड़े साइज़ की बाल्टी के आकार के कागज़ के डिब्बों  में पॉपकॉर्न लेकर आना शुरू कर चुके थे। इससे उठती  महक ने हमारी भूख की भड़कती अग्नि में मानो घी डाल दिया। वो तो भला हो साथ की सीट पर बैठे श्रीमान विनोद बंसल की बिटिया विदुषी का जो उठकर गयी और तीन लार्ज पॉप कॉर्न के डिब्बे ले आई। एक सादा नमकीन, एक चीज़ वाले और एक कैरामल के स्वाद वाले। मालूम नहीं कि ये विदुषी के उठ के जाकर पॉपकॉर्न लाने का कमाल था या देरी के लिए किये जाने वाली बंसल साहब की ट्वीट का कि ऐसा होने के कुछ समय बाद फिल्म चालू हो गयी। 

यकीन मानिये फिल्म देखने के बाद न मुझे और न ही सीमा को उस देरी पर कोई गिला शिकवा रहा जो अबतक हुई थी। सबसे पहली बात तो ये कि ये एक बेहद साहसपूर्ण विषय पर बनाई फिल्म है। फिल्म देखने जाते हुए मन में था कि कहीं ये महज एक नज़रियाती प्रॉपेगण्डा फिल्म ही न हो। सोचा था कि यदि ऐसा हुआ तो हम बीच में उठकर चले आएंगे। इससे हमें बुलाने वाले कपिल मिश्रा के आग्रह की इज़्ज़त भी रह जाएगी और हमारा समय भी जाया नहीं होगा। पर ऐसी नौबत नहीं आयी और अगर एक दो दृश्यों को छोड़ दिया जाये तो फिल्म ने हमें लगातार बांधे रखा। सीमा को अगली सुबह जल्दी ऑफिस जाना था तो भी उन्होने कहा कि अब तो पूरी फिल्म देखनी ही है। 

फिल्म की कहानी को देखा जाये तो मध्यांतर तक फिल्म थोड़ी हलकी फुल्की रहती है। अच्छा संगीत, दृष्यानुसार गीत और सुरुचिपूर्ण लोकेशन फिल्म को गति देते हैं। गीत कर्णप्रिय हैं।वाराणसी के घाट, कैम्पस की बिंदास ज़िन्दगी और एक संस्कारवादी हिन्दू माता पिता तथा उनकी  'मॉर्डन' बेटी के बीच के टकराव का अच्छा चित्रण निर्देशक विनोद तिवारी ने किया है। कहानी लिखी है वंदना तिवारी ने। फिल्म ये बताने में सफल है कि 'लवजिहाद' अब हिंदूवादियों की एक राजनीतिक फेंटेसी मात्र नहीं बल्कि ऐसी सचाई है जिससे समाज को लगातार दोचार होना पड़ रहा है। यों तो प्यार और जिहाद दो कभी न मिलने वाले अलग-अलग किनारे जैसे लगते हैं, मगर मजहबी कट्टरता कई बार आदमी को इंसान बने नहीं रहने देती। धर्मान्धता में अपने मजहब के विस्तार के लिए कैसे प्रेम जैसी पवित्र भावना का दुरुपयोग हो सकता है फिल्म इसे गहनता के साथ उकेरती है। 

फिल्म के डायलॉग और बेहतर हो सकते थे। मगर कहानी के अलावा 'द कन्वर्जन' का सबसे सशक्त पक्ष है हीरोइन का पात्र निभाने वाली अभिनेत्री का अभिनय। मुझे नहीं मालूम कि अभिनेत्री विंध्य तिवारी ने इससे पहले कौन से फिल्म की है। मगर बाप रे बाप क्या अभिनय क्षमता है इस अभिनेत्री में। एक ही किरदार में अनेक कठिन भाव बड़ी कुशलता के साथ उसने निभाए है। एक बिंदास भरी उत्श्रंखलता से लेकर असहनीय अत्याचार और दर्द सहने वाली नायिका का सशक्त अभिनय विंध्य तिवारी ने किया है। सच मानिये तो हीरोइन की शुरुआती एंट्री इतनी अधिक प्रभावित नहीं करती पर जैसे फिल्म आगे बढ़ती है वैसे ही शृंगार, करुणा, भय, छल, क्रोध और रौद्र आदि कई जटिल भावों को वे बड़ी सहजता से निभाती नज़र आतीं है। 

फिल्म के कई दृश्य बहुत भावपूर्ण है। मुझे सबसे सबसे अधिक मार्मिक दृश्य लगता है कि जब फिल्म में साक्षी बनी अभिनेत्री निकाह के समय अपना नाम बदलने को मज़बूर होती है। जिस गहराई के साथ सिर्फ अपनी आँखों के ज़रिये अपने हुए साथ हुए अनजाने छल को विंध्य अभिनीत करती हैं वह उनकी अभिनय क्षमता का नमूना है। हलाला की घृणित क्रूरता विचलित कर देने वाली है। निर्देशक की दाद देनी पड़ेगी कि वे इस दौरान आम मुम्बईया फिल्मों की तरह सेक्स दिखाने के लालच से बचे रहे। आप अपनी जवान होती बेटी के साथ फिल्म को देखने में असहज नहीं होते। बबलू शेख की भूमिका में प्रतीक शुक्ला ने भी जोरदार अभिनय किया है। 

कुल मिलाकर एक नाज़ुक विषय पर बनी एक सशक्त फिल्म है 'द कन्वर्जन'। मुद्दा विवादास्पद होने के साथ साथ समीचीन भी है। फिल्म पर राजनीति होना भी अवश्यम्भावी है। निर्देशक विनोद तिवारी ने शुरू में बताया ही था कि उनकी फिल्म महीनों सेंसर बोर्ड में लटकी रही थी। देखा जाये तो मजहब, राजनीति, विवाद और स्त्रीविमर्श - ये सब मिलकर बॉक्स ऑफिस पर इसकी सफलता की कहानी अभी से कह रहे हैं । 


Saturday, January 22, 2022

'कौन कहता है कि मुसलमान योगी को वोट नहीं देंगे?"




'कौन कहता है कि मुसलमान योगी को वोट नहीं देंगे?"


30 साल के एक मुस्लिम युवक ने जब ये बात मुझसे कही तो मैं थोड़ा चौंक गया।  

इसी मंगलवार को मुंबई में परेल से छत्रपति शिवाजी महाराज हवाई अड्डा जाने के लिए मैंने टैक्सी मँगाई थी। चूँकि उबर की ये टैक्सी मेरे बेटे ने बुक की थी इसलिए मुझे चालक का नाम नहीं पता था। मुझे टैक्सी चालकों से गपशप करना अच्छा लगता है। इस दौरान अक्सर ज़िन्दगी की अक्सर ऐसी तसवीरें देखने को मिल जाती हैं जिनसे हम अन्यथा वंचित रहते हैं। 




इसीलिए बातचीत शुरू करने के लिए आदतन मैंने चालक से नाम पूछा था। उसने बड़े नम्र और मीठे लहजे में कहा था "समीर सर।" 

मुंबई में बेहद सधी और साफ़ हिंदी बोलते देख मुझे लगा कि वो उत्तर प्रदेश से है। दो यूपी वाले मिलें और राजनीति की बातें न हो ऐसा कैसे हो सकता है? बात आगे बढ़ी तो सहज ही उत्तर प्रदेश के चुनाव का ज़िक्र भी होना ही था । 

मैंने उससे कहा कि "इस बार अखिलेश और योगी में मुकाबला कड़ा दिखाई देता है।" समीर ने सहजता से कहा कि "आपको मुकाबला कितना भी कड़ा दिखाई देता हो, योगी ही जीतेंगे।" 

मैंने पूँछा "क्यों?" 

समीर ने जबाव दिया कि "अयोध्या का टंटा जिस आसानी के साथ उन्होंने निपटाया है, और किसी मुख्यमंत्री के बूते की बात नहीं थी। नहीं तो ये यूँ ही लटकता रहता।"


उसकी बातों से मुझे लगा कि वह कोई  योगी 'भक्त' या पुश्तैनी #भाजपा समर्थक हैं। मैं उसकी राजनैतिक प्रतिबद्धता को लेकर मन ही मन में अनुमान लगा ही रहा था कि समीर ने खुद ही एलान किया कि वह मुसलमान होते हुए भी वे ये बात कह रहा है। इस बात पर मेरी उत्सुकता थोड़ी और बढ़ गई। उसने कहा कि उसका पूरा नाम है समीर मोहम्मद। 


उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की रानीगंज तहसील के सिंदौड़ा गाँव के रहने वाले समीर मोहम्मद मुंबई में टैक्सी चलाते हैं। अभी भी गाँव में भी उनका वोट है और ग्राम प्रधान के पिछले चुनाव में वे वहां वोट डालकर आये थे। गाँव आते जाते रहते हैं। उनका पूरा परिवार अभी भी वहीं हैं। उन्होंने बताया कि परिवार में उनके माता पिता, दो बहनें, तीन भाई, पत्नी और चार साल की प्यारी बेटी शमा है। 


उनके परिवार के पास गाँव में भी टैक्सी है, जिसे वे जब वहां होते हैँ तो खुद चलाते हैं। नहीं तो उनके भाईबंद उस टैक्सी को चलाते हैं। प्रतापगढ़ से सुल्तानपुर होकर अयोध्या कोई 110 किलोमीटर की दूरी पर है। कोई डेढ़ दो घंटे में आप वहाँ पहुँच सकते है। उन्होंने बताया कि सवारियों को लेकर उनका अयोध्या आना जाना लगा ही रहता है। 


मेरे मन में स्वाभाविक सवाल उठा कि राममंदिर मसला हल होने से आखिर #अयोध्या के आसपास रहने वाले एक मुसलमान युवक को भला क्या फायदा हो सकता है? इसलिए सीधे ही मैंने ये सवाल पूँछ लिया। समीर ने मुझे समझाया कि जब वे पहले प्रतापगढ़ से अयोध्या टैक्सी लेकर जाते थे तो हिन्दू #मुसलमानों के बीच में एक अनकहा मगर स्पष्ट खिचाव और तनाव रहता था। मुसलमान डरते थे कि कल ना जाने क्या हो? और हिन्दू खीजते थे कि उनका मंदिर नहीं बन रहा। दशकों से बस इसके बहाने राजनीति का खेल हो रहा था।  


उन्होंने कहा कि " क्योंकि अब इस मुश्किल मसले का समाधान निकल गया है तो लम्बे समय से दोनों के बीच जड़ जमाये बैठा का वो खिंचाव भी दूर हो गया है। मामला सही तरीके से सुलट गया है और दोनों (समुदाय) ही आगे बढ़ गये हैँ।"


मैं सोचने लगा कि जाने अनजाने में समीर मोहम्मद एक बड़ी बात कह गए हैं। #उत्तरप्रदेश की राजनीति को सिर्फ खांचों में बांटकर रात दिन उसके विश्लेषण में लगे विशेषज्ञ इसे नहीं समझ पाते। असल बात है कि आम आदमी का मन हमेशा के लिए किसी  संघर्ष, विवाद या झगड़े में नहीं पड़ा रहना चाहता। वह तो पैदा हुए तनावों को निपटा कर अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में आगे बढ़ना चाहता है। इसलिए चाहे निजी जिंदगी हो या फिर सामाजिक जीवन, उलझी डोरों को सुलझाने वालों को हमेशा समाज में आदर और सम्मान की नज़रों से देखा जाता हैँ। हमारे साहित्य के वांग्मय में ही नहीं, ग्रामीण बोलचाल में भी पंच के ओहदे को इसीलिये मान दिया जाता है।  


समीर के मुताबिक मोदी/योगी की जोड़ी ने देश के इस जटिलतम विवाद को गति, सहजता और सुगमता से समाधान की और बढ़ाया है। जिस सरलता से समीर मोहम्मद ने इसका विश्लेषण किया उसे इस तरह से मैंने कभी देख ही नहीं पाया था। #राममंदिर के मुद्दे पर शायद इसी नाते हमारा मीडिया, राजनेता, बुद्धिजीवी वर्ग और विश्लेषक एकांगी होकर सोचते रहे हैं। एक साधारण से दिखने वाले एक टैक्सी चालक ने मुझे एक नया नज़रिया देकर उस दिन एक गहरा सबक सिखा दिया। 


समीर मोहम्मद ने एक पते की बात और कही। उन्होंने बताया कि उनका गाँव एक #हिन्दू बहुल गाँव है। उसमें हर जात बिरादरी के लोग रहते हैँ। लेकिन कई साल से गाँव की प्रधानी एक #मुसलमान के हाथ में है। उसने कहा कि जिस तरह गाँव में बाकी सारे लोग सगीर अहमद को वोट देकर ग्राम प्रधान बनाते हैँ इसी तरह प्रदेश में मुसलमान भी योगी को वोट देंगे, इसमें हैरानी की बात क्यों होनी चाहिए? 


समीर के तर्क में वाकई दम था। फिर भी मैंने उसे आगे कुरेदते हुए पूछा कि "योगी और भाजपा को तुम अकेले ही समर्थन की बात कर रहे हो या फिर उनके बाकी कोई साथी भी ऐसी बात कहते हैँ?" समीर का जवाब था कि उनका पूरा कुनबा एक साथ ही चलता है। उनके कुनबे और बिरादरी के लोगों को भाजपा और योगी से कोई मलाल नहीं है। असल बात तो ये है कि 2014 के बाद से प्रदेश के मतदाताओं का व्यवहार इस ओर साफ़ इशारा करता आ रहा है। जिसमें खासकर युवा वर्ग का मतदाता सिर्फ जात, बिरादरी और मजहब के आधार पर वोट नहीं डाल रहा। जरूरत उसके इस रुझान को साफ़ चश्मे से देखने भर की ही है।  


एक बात और, इसी कालावधि में डिजिटल और सोशल मीडिया का असर भी अत्यंत प्रभावकारी हो गया है। जिसने संवाद में बिचौलियों की भूमिका को काफी सीमित कर दिया है। नए माध्यमों से जानकारी लेने वाले अब सीधे बात पहुंचा भी रहे हैं और ग्रहण भी कर रहे हैं। ये लोग अब पुराने वैचारिक जंजालों, पूर्वाग्रहों और राजनैतिक विचारों के बंदी नहीं हैं। उनका राजनीतिक व्यवहार एक बड़ी हद तक 'उन्हें आज क्या मिला' और 'किसी ने उनके लिए अभी क्या किया' इससे संचालित हो रहा हैं न कि पुरानी वैचारिक गठरियों से। समीर की बातों में इसी सोच की झलक मुझे मिली। 


मैंने समीर से कहा कि लोग तो #अखिलेशयादव और योगी के बीच कड़ी टक्कर बता रहे हैँ।  उसका कहना था कि कोई कैसी भी टक्कर बताये, योगी जैसा मुख्यमंत्री मिलना मुश्किल है। मैंने जब उससे इसका मतलब पूछा तो उसने कहा कि "देखिये साहब हमारे राज्य में तो शासन धमक से ही चलता है। अगर अफसरों पर कड़ाई न करो तो राज चल ही नहीं सकता। योगी कि धमक ही अलग है। वो लगते हैँ कि वाकई धाकड़ मुख्यमंत्री हैँ।" उसने कहा कि उसे अच्छा लगता है कि योगी मुँह देखे का टीका नहीं करते। वो हरेक के मुँह पर उसके जैसी बात नहीं करते बल्कि अपने तरह से जो बात सही लगती है उसे करते हैं। वे  ऐसा करते ही नहीं उसपर कड़ाई से अमल भी करवा लेते हैँ। 


समीर कि बातें दरअसल बहुत दिलचस्प होने के साथ साथ उन बहुत सी प्रचलित धारणाओं को भी तोड़ रहीं थीं जो अक्सर टीवी, अखबार और सोशल मीडिया पर चल रहीं अनर्गल बहसों ने हमारे मन में बिठा दीं हैँ। ये कथित विशेषज्ञ राजनीति की चादर को बस सफ़ेद या काले रंग में पोतना चाहते हैँ। जबकि राजनीति और जीवन तो अनेक रंगों से भरा एक इंद्रधनुष है। उसके पटल में अनेक रंगों और भावों की अनगिनत छटायें बिखरी हुईं हैँ। यही नए रंग उस दिन मुझे समीर ने दिखाए। 


चलते चलते समीर ने अपनी मीठी सी बेबाकी के अंदाज़ में दो भविष्यवाणियाँ भी की। पहली ये कि अगर #योगी को पांच साल मिल गए तो "हमारे #यूपी में भी गुजरात की तरह तरक्की हो जायगी।" और दूसरी, कि अगर ऐसा हुआ तो फिर योगी के लिए दिल्ली बहुत दूर नहीं रहेगी। अब समीर मोहम्मद की भविष्यवाणी सही होगी कि नहीं ये तो वक्त ही बताएगा मगर उनकी बातें मुझे बेहद तर्कसंगत, समझदारी वाली और दिलचस्प लगीं। मैंने बाकायदा उनकी इजाजत से उनकी फोटो भी ली। उन्हीं की मर्ज़ी से ये बाते भीं साझा कर रहा हूँ।



Saturday, January 15, 2022

उत्तर प्रदेश : #योगी ही सबसे बड़ा मुद्दा


#उत्तरप्रदेश के चुनावी दंगल में राजनीतिक पहलवानों और उनकी टोलियों ने ताल ठोकना शुरू कर दिया है। अचानक कुछ पहलवानों को उन अखाड़ों को बदलने की सूझ रही है जिनमें वे पांच साल से दंड पेल रहे थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया पर ट्रेंड, अदलाबदली और शाब्दिक जूतमपैजार का हल्ला जोरों पर है। ये सब हो रहा है प्रदेश के वोटरों को ललचाने, रिझाने या फिर अपने पाले में समेटने के लिए। इस मारामारी से अलग हमने इस लेख में जनता की नब्ज़ जानने और उसका आकलन करने की कोशिश की है।


#योगीआदित्यनाथ जब पाँच साल पहले अप्रत्याशित रूप से उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो सबके मन में एक ही सवाल था। 'ये सन्यासी क्या पॉंच साल चल पायेगा?' सवाल लाजिमी था क्योंकि प्रदेश पर शासन करना हमेशा ही टेढ़ी खीर रहा है। पाकिस्तान से भी अधिक जनसँख्या वाले यू पी को हम उत्तर प्रदेश वाले कई बार मज़ाक में उल्टा प्रदेश भी कह जाते हैं। खाँटी राजनेताओं तक को इस प्रदेश की जनता पानी पिलाती रही है। योगी आदित्यनाथ को तो कोई प्रशासनिक अनुभव भी नहीं था। लोगों का कहना था कि प्रदेश की घुटी हुई नौकरशाही से पार पाना इस नए मुख्यमंत्री के लिए इतना आसान नहीं होगा। 


उत्तर प्रदेश में शिक्षा का स्तर भले ही देश के औसत से कम हो, पर यहाँ राजनीति की घुट्टी हर नागरिक को जन्मते ही मिल जाती है। एक अनपढ़, निर्धन और गँवार सा दिखने वाला एक सामान्य देहाती भी आपको यहाँ वो राजनीतिक ज्ञान दे जाएगा जो दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में अपने लेपटॉप पर बैठे 'राजनीतिक विश्लेषक' समझ ही नहीं पाते। इसलिए इन दिनों टीवी पर और सोशल मीडिया पर जो राजनीतिक शोर चल रहा है उस पर मत जाइये, वह बंद कमरों में बैठे ज्ञानियों द्वारा मचाया जा रहा कोलाहल मात्र है। ये शोर कई बार प्रायोजित और बहुधा पूर्व निर्धारित होता है जो दर्शकों, पाठकों और श्रोताओं के समक्ष तर्क की चाशनी में डुबोकर कर पेश किया जाता है। 


यों भी चुनावों से एकदम पहले या उनके दौरान जो गहमागहमी, आवाजाही और बहसा-बहसी होती है उसका मतदाताओं पर आंशिक ही असर पड़ता है। मेरा मानना है कि अगर कोई अप्रत्याशित घटना न हो जाए तो मतदाता कुछेक महीनों पहले ही मोटे तौर पर अपना मन बना लेते हैं कि किसे जिताना है और किसे विदा करना है। चुनाव घोषित हो जाने के बाद टिकट वितरण को देखकर अब जो राजनीतिक चलाचली हो रही है उसका कोई बहुत असर अंतिम परिणामों पर नहीं पड़ने वाला। 


एक और बात, चुनाव में किसको कितनी सीटें मिलेंगी ये या तो कोई ज्योतिषी बता सकता है या फिर ऊपरवाला। सीटों की संख्या का अनुमान लगाना उफान पर आये समुद्र की लहरों को गिनने जैसा ही है। ऐसा करने वाले दस में से साढ़े नौ बार औंधे मुंह ही गिरते हैं। कुल मिलाकर ये घनघोर सट्टेबाज़ी जैसा काम हैं जिसमें पड़ना एकदम फालतू की कवायद है। चुनाव कवर करने के अपने कोई साढ़े  तीन दशक के मेरे अनुभव का एक ही निचोड़ है कि आप पत्रकार होने के नाते बस एक अंदाजा लगा सकते हैं कि चुनाव में मुख्य मुद्दा क्या है? यानि वोटर के मन में क्या चल रहा है ये अगर मोटे तौर पर भी आप सूँघ पाएँ तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हवा किस ओर बहेगी। बाकी सब या तो ख्याली पतंगबाज़ी है या फिर पूर्व नियोजित राजनीतिक पैतरेबाजी। 


लोगों के मन में क्या चल रहा है ये जानने के लिए कुछ दिन पहले मेरा उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में जाना हुआ। मैं गया भी एक सामान्य यात्री के तौर पर न कि पत्रकार के नाते। पत्रकार बताते ही लोगों के कान खड़े हो जाते हैं और आम लोग अपने मन को नहीं खोलते। इस दौरान मैंने सामान्य लोगों की नब्ज़ टटोलने की कोशिश की। इसके बाद मैंने उन कई लोगों से बातचीत भी की जो पत्रकारीय मकसद से उत्तरप्रदेश का दौरा करके आये हैं। मेरे एक पूर्व सहयोगी प्रवीण तिवारी तो एक अखबार के लिए प्रदेश के 271 चुनाव क्षेत्रों का दौरा करके लौटे हैं। उनके मुताबिक उन्होंने पिछले कुछ महीनों में प्रदेश की कोई 6000 किलोमीटर सड़कों की धूल चाटी है। ऐसे ही कई और भी लोगों से बातचीत हुई जो टीवी स्टूडियो या दफ्तरों से बाहर लोगों के बीच लगातार जाकर राजनीतिक मौसम भांपने की कोशिश करते रहे है।


इसके आधार पर एक बात तो साफ़ निकलती है वो है कि इस बार चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा स्वयं मुख्यमंत्री योगी ही हैं। इसका मतलब है कि उन्होंने जिस तरह राज्य में शासन चलाया है वो लोगों के मन में वोट देने का सबसे बड़ा मानक होने जा रहा है। इसका मतलब ये कतई नहीं है कि अन्य कोई मुद्दे राज्य में नहीं हैं। चुनाव एक जटिल और बहुस्तरीय प्रक्रिया है। इसमें कई चीजों का घालमेल होता है। जब भी कोई चुनाव होता है तो बेरोज़गारी और महंगाई तो ऐसे सदाबहार मुद्दे होते है जैसे बंबईया कटिंग मसाला चाय में चायपत्ती। चाय में पत्ती को तो होना ही है। इसलिए जब चैनल, अखबार और विश्लेषक इनकी चर्चा करें तो इन्हें चुनावी तराज़ू के पासंग जैसा ही मानना चाहिए।  


आश्चर्यजनक रूप से इस बार भ्रष्टाचार की चर्चा उस तरह से किसी ने नहीं की जिस तरह पिछली सरकारों के समय उत्तर प्रदेश में होती रही है। बीएसपी की सुश्री मायावती रही हों या फिर सपा के श्री अखिलेश यादव के समय के चुनाव - सरकारी भ्रष्टाचार हमेशा उत्तर प्रदेश में बड़ा मुद्दा रहा है। मौजूदा मुख्यमंत्री पर इस तरह का कोई बड़ा आरोप नहीं लगना और इसकी कोई गंभीर चर्चा न होना एक बड़ा संकेत है। उत्तर प्रदेश का शासन धमक से ही चलता है। योगी आदित्यनाथ ने जिस कड़ाई से नौकरशाही को हाँककर काम करवाया इसकी तारीफ आमतौर से सबने की। इस सिलसिले में लोगों ने घर घर में बने शौचालयों और स्वच्छता अभियान का जिक्र किया।  


योगी का व्यक्तित्व उत्तर प्रदेश में मुख्य  मुद्दा है तो अखिलेश उनके सबसे प्रबल प्रतिद्वंदी है, ये बात भी उत्तर प्रदेश के गली नुक्क्ड़ों की गपशप में साफ़ नज़र आई। प्रियंका गाँधी की तमाम कोशिशों के बावजूद काँग्रेस अब भी खेल से बाहर ही दिखाई देती है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से मायावती की बीएसपी अब गंभीर प्रतिद्वंदी नहीं रह गयी है, ये भी लोग सीधे सीधे कहते मिले। महत्वपूर्ण है कि समाजवादी पार्टी से सहानुभूति रखने वाले एक मित्र ने कहा कि "अखिलेश ने प्रदेश में देर से शुरुआत की है। अगर वे कुछ महीनों पहले सक्रिय हो गए होते तो बहुत अच्छा होता।"


जो लोग ब्राह्मण-ठाकुर, पिछड़ा-अगड़ा और जातिवाद के मुद्दों को सबसे प्रमुख रूप में प्रचारित कर रहे है वे भी आंशिक रूप से ही सही हैं। असलियत तो ये है कि देश का कोई चुनाव ऐसा नहीं है जिसमें जाति की भूमिका नहीं होती। जाति को कुछ लोग तलवार के रूप में तो कुछ ढाल के रूप में इस्तेमाल करते है। जो अपने देश में हमेशा होगा ही। मगर ये प्रदेश के आगामी चुनावों का सबसे बड़ा कारक नहीं होने जा रहा। अगर जातिगत गणित ही मुख्य होता तो मूलतः जातपाँत के खम्बो पर ही टिकी बीएसपी को आज प्रमुख प्रतिद्वंदी के तौर पर होना चाहिए था। पर ऐसा अभी तक तो लगता नहीं है।  


चुनाव किस मुद्दे पर लड़ा जा रहा है इसकी बानगी मुझे लखनऊ और अयोध्या में मिली। जब मैं तीन हफ्ते पहले राजधानी लखनऊ शहर की पर्यटन यात्रा पर था तो मेरे चालक और गाइड नूर मोहम्मद ने जो बात कही थी वो प्रदेश के आने वाले चुनावों के प्रमुख मुद्दे को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है। हुसैनाबाद इलाके में घंटाघर के पास अच्छी साफ-सफाई और व्यवस्था पर नूर ने मुझसे कहा था "ये सब अखिलेश ने करवाया था, उनके जाते ही रुक गया।" 


मगर अयोध्या में ये तस्वीर बिल्कुल पलट जाती है। अयोध्या में मेरे साथ चल रहे देवेश वहाँ योगी- मोदी की जोड़ी द्वारा कराये गए कामों के बारे में बताते हुए थकते ही नहीं थे।  चाहे फैज़ाबाद में गुप्तार घाट का विस्तार हो; अयोध्या में सरयू की पैड़ी पर जल के लगातार प्रवाह की व्यवस्था हो या दीपदान का कार्यक्रम - उनके मुताबिक जो काम योगी सरकार ने करवाया, वैसा कभी नहीं हुआ। वाराणसी में काशी कॉरिडोर के उद्घाटन और रामजन्मभूमि मंदिर के निर्माण कार्य की भी उन्होंने खूब चर्चा की।


#अयोध्या और #काशी के कामों की बात #उत्तरप्रदेश चुनाव की हर चर्चा में प्रखरता से उठी। कुल मिलाकर मेरा आकलन है कि अयोध्या/काशी के काम और उससे उत्पन्न ध्रुवीकरण इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा रहने वाला है। प्रदेश की महिलाएँ, युवा और नए मतदाता भी खूब इस मुद्दे की बात करते मिले। अगर ऐसा है तो फिर तमाम किन्तु परंतुओं के बीच गोरक्ष पीठ के इस औघड़ बाबा के सितारों को बुलंद ही समझना चाहिए।

#UPelections #UP #UttarPradesh #YogiAdityanath #Yogi #AkhileshYadav #Mayawati #BJP #SP #BSP




Saturday, November 20, 2021

कृषि कानून वापसी - यथार्थ पर भारी पड़ा मिथ्या प्रचार / कोई भी कृषि सुधार सिख-हिन्दू भाईचारे से महत्वपूर्ण नहीं





युद्ध जीतने के लिए कभी कभी कुछ मोर्चों से पीछे हटना ज़रूरी होता है। अच्छे सेनापति वो होते हैं जो किसी एक मोर्चे पर अटक कर नहीं रह जाते। वे अपनी लक्ष्यसिद्धि के सदा नए नए रास्ते तलाशते है। देश में लम्बे समय से एक युद्ध चल रहा है वह है ग्रामीण विपन्नता के साथ युद्ध। जब तक देश का कृषि क्षेत्र उन्नत नहीं होगा सम्पूर्ण देश गरीबी के दुष्चक्र से बाहर नहीं आएगा। दशकों से किसान संगठन, अर्थशास्त्री और कृषि विशेषज्ञ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे थे। तीन कृषि कानून उसी लम्बे विमर्श के नतीजे में आये थे। पर कोई भी युद्ध बिना सैनिकों की भागीदारी के जीता नहीं जा सकता। 

ग्रामीण अर्थव्यस्था सुधार के इस युद्ध में किसान एक तरह से अग्रिम पंक्ति के सैनिक ही हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश अन्न उपजाने के मामले में देश का अग्रणी हिस्सा है। पंजाब देश का सीमावर्ती राज्य होने के कारण बेहद संवेदनशील प्रान्त है। इस भूभाग के किसानों को सरकार समझा ही नहीं पाई कि किसान कानून उनके हित में हैं। कई विरोधी ताकतें, जिनमें देश के दुश्मन पाकिस्तान और चीन शामिल है, ये प्रोपेगंडा फैलाने में सफल रहे कि तीनों कानून उनके खिलाफ हैं। पंजाब बड़े समय तक आतंकवाद भी झेल चुका है। चाहे मुट्ठीभर ही सही, पर वहां विदेशपोषित कुछ तत्व तो है हीं जो राष्ट्रद्रोही अलगाववादी मनोवृत्ति रखते हैं। इन्होंने किसानों के असंतोष की आग में खूब घी डाला।  

कृषि बिल विरोध की आड़ में पंजाब में हिन्दू सिख भाईचारे को भी नुक्सान पहुँचाने की भरसक कोशिश हुईं। 26 जनवरी की लालकिले की घटना को इससे जोड़कर देखा जा सकता है। पाकिस्तान ने इस दौरान वहां की शांति में खलल डालने के लिए ड्रोन द्वारा हथियार भी भेजे। इसका जिक्र पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने लगातार किया है। खालिस्तान के नाम पर चले आतंकवाद के उस दौर को दोहराने के लिए कई तत्व आमदा हैं। इसकी अनदेखी कोई सरकार नहीं कर सकती। इसी सिलसिले में एनआईऐ  की एक टीम पिछले दिनों कनाडा में थी। उसका फीडबैक भी महत्वपूर्ण रहा होगा। पंजाब में अमनचैन से बड़ा कोई कृषिसुधार नहीं हो सकता। 

कृषि सुधारों से एक बड़े बिचौलिए वर्ग को भी कठिनाई हो रही थी। सरकार अपने संवाद की विफलता का विपक्ष को दोष नहीं दे सकती क्योंकि दूसरे दलों का तो काम ही विरोध करना है। कुल मिलाकर इन सबका एक घातक मिश्रण बन गया। स्वभावतः सरल ग्रामीण मन को इन सबने बरगलाया और एक बात इस भूभाग के किसानों के मन में बिठा दी कि ये कानून उनकी जमीन तक हड़पने के औज़ार बन सकते हैं। किसान अपनी ज़मीन से अपनी संतान से भी ज़्यादा लगाव रखता है। बात चाहे गलत ही थी, पर कई बार दुष्प्रचार भी यथार्थ से अधिक शक्तिशाली बन जाता है। सरकार और भाजपा का प्रचार तंत्र इसके सामने बौना पड़ गया। इस बीच केंद्र सरकार सिर्फ कृषि कानून विरोध को विपक्षी दलों का प्रचार मानकर अपनी धुन में ऐंठी रही। 



वैसे बीजेपी को उसी समय चेत जाना चाहिए था जब उसका सबसे पुराना सहयोगी अकाली दल पंजाब में इस मुद्दे पर गठजोड़ तोड़कर केंद्र सरकार से अलग हो गया था। जहाँ एक और सरकार किसानों से संवाद में विफल रही वहीँ दूसरी और ये एक बड़ी राजनीतिक विफलता भी थी। इस राजनीतिक विफलता का शिकार भाजपा महाराष्ट्र में पहले शिवसेना के साथ करके एक बड़ा राज्य गवाँ ही चुकी है। गठबंधन धर्म के मर्म को समझने में विफलता तथा उससे उत्पन्न संकेतों को न पढ़ पाने पर तुलसीदास की एक पंक्ति कही जा सकती है - 'सत्ता मद केहि नहि बौराया।'

विपक्षी दल कह रहे हैं कि मोदी ने ये फैसला उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा व् अन्य राज्यों के चुनावों के मद्देनज़र किया है। ऐसा किया है भी तो इसमें गलत क्या है। राजनीतिक दलों का काम ही हैं कि वे जनता की नब्ज़ पहचाने और उसके अनुसार अपनी नीतियों में बदलाव करें। चुनाव जीतने के लिए कोशिश करना उनका मूल धर्म है। मोदी ने चुनाव जीतने के लिए अगर ये ऐलान किया है, तो क्या अखिलेश यादव, राहुल गाँधी, मायावती, ममता बनर्जी, केजरीवाल आदि रामनामी ओढ़कर संन्यास पर जाने के लिए किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे थे?  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुपरब पर राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में संवाद की सरकारी विफलता को ठीक पहचाना और तीनों कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर जता दिया कि वे सच्चे मायनों में जनता के मन को पढ़ना जानते हैं। मोदी सदा फ्रंटफुट पर खेलते आये हैं। इस नाते इस बड़े फैसले को अपने ऊपर ओढ़कर उन्होंने बड़े मन और लचीलेपन का भी परिचय दिया। इस सम्बोधन की भाषा, शैली और हावभाव ने उनका कद और बढ़ा दिया है। अपनी बात से पीछे हटने के लिए, वह भी सार्वजनिक तौर पर, बड़ा कलेजा और साहस चाहिए। मोदी जैसा बड़ा नेता ही ऐसा कर सकता है। इसलिए ये एक साहसी निर्णय है जो  उनके जैसे कद्दावर नेता के ही बूते की बात है।