Thursday, March 19, 2020

कोरोना वायरस को हरा सकता है भारत


कल सुबह अखबार में एक अच्छी खबर पढ़ने को मिली। ये खबर आई थी लंदन से। इसमें जो ओसीआई कार्ड होल्डर विदेशों, खासकर इंग्लैंड,  में रहते हैं, उन्होंने जिस तरह भारत कोरोना वायरस का सामना कर रहा है उसकी खुली तारीफ की। वैसे इस विषाणु का सही नाम तो कोविद-19 है पर बोलचाल की भाषा में इसे सिर्फ कोरोना कहा जा रहा है। ओआईसी कार्ड उन भारतवंशियों को मिलता है जो विदेशी नागरिक  होने के बावजूद आमतौर से बिना वीज़ा के भारत आजा सकते हैं और काम कर   सकते हैं। वे ब्रिटेन के नागरिक होते हुए भारतीयता के लाभ उठा सकते हैं। अर्थात एक तरह से उनके पास दोहरी नागरिकता है। इस खबर के मुताबिक भारतीयों ने कहा कि ब्रिटेन उस तरीके से कोरोना वायरस के फैलने को रोक नहीं पाया है जिस तरीके से भारत ने किया है।

इनमें से अधिकतर ने भारत आने की इच्छा भी जताई। इन्होने कहा कि कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के जो इंतजाम इंतजाम भारत ने किए हैं वह काबिले तारीफ हैं। उन्होंने ये भी कहा कि वे ब्रिटेन के बजाय कोरोना से भारत में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते है। ऐसी बात कहने वाले कई युवा भी थे। उन्हें इस बात से तकलीफ है कि भारत ने फिलहाल उनकी यात्रा पर पाबन्दी लगा दी है।  

उन्होंने बार-बार कहा कि ब्रिटेन का जो हेल्थ केयर सिस्टम यानि  एनएचएस है  वह अभी तक वायरस को  फैलने से रोकने के प्रभावी कदम उठाने में विफल रहा है। एक के बाद एक कई भारतवंशी ब्रिटिश नागरिकों ने भारत आने की इच्छा जताई ताकि वह भारत की बेहतर और कहीं किफायती स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठा सकें।  सोचने की बात है कि कुछ ही साल में कितना फर्क आ गया है?  कल तक इनमें से अधिकांश भारतवंशी भारत में गंदगी, अव्यवस्था और चिकित्सा सुविधाओं के अभाव का हवाला देते थे। सामान्य समय में भी ये भारत आने से कतराते थे।  आज इस महामारी के कठिन समय में भारत आने की गुहार लगा रहे है। कल तक हमारे देश के लोग इलाज कराने के लिए ब्रिटेन जाते थे और आज ब्रिटेन के लोग कह रहे हैं कि उनका स्वास्थ्य सिस्टम उतना अच्छा नहीं है। 

हैरत की  बात ये है  कि भारत के बारे में यह सराहना उस ब्रिटेन से आ रही है जिसके एक अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने पिछले ही दिनों  भारत पर तंज कसते हुए कहा था कि भगवान का शुक्र है कि यह बीमारी भारत में नहीं पैदा हुई बल्कि चीन से निकली है। नील गोल्डमैन सैच के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री है। उन्होंने एक टीवी कार्यक्रम में  तकरीबन भारत का मज़ाक उड़ाते हुए कहा था कि जिस तरह चीन के प्रशासनिक तंत्र और सरकार ने कठोर कदम उठाते हुए इस महामारी का सामना किया है वैसा भारत तो कर ही नहीं सकता। लेकिन वे शायद ये यह भूल गए कि भारत के लोगों  पर जब संकट आता है तो वह चट्टान की तरह उठ खड़े हो जाते हैं बशर्ते उनको सही दिशा देने वाला हो। वैसे भी ब्रिटेन के कुछ बुद्धिजीवी अभी  इतिहास में ही जी रहे है। नील भी उन्हीं में से एक लगते है। उन्हें चाहिए कि वे अपने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर ध्यान दें तथा भारत को बख्श दें।

वैसे चीन में जब इस अज्ञात शत्रु ने अपना खेल शुरू किया तो कई लोगों के मन में ये सवाल था कि यदि ये भारत में आएगा तो क्या होगा ? सवाल सही भी था क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में हमारा पुराना रिकार्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है। हमारी इतनी बड़ी जनसंख्या को देखते हुए क्या भारत इसको रोक पायेगा यह आशंका सब के मन में थी? लेकिन जिस तरीके से अब तक भारत के आम लोगों, स्वास्थ्य सुविधाएं देने वाली एजेंसियों और सरकारी तंत्र ने इस संकट का सामना किया है वह अद्वितीय है।

सोचिए, ये वही डॉक्टर और स्वास्थ्य अधिकारी हैं दिन रात जिनकी हम आलोचना करते रहे  हैं। वहीं स्वास्थ्य केंद्र,  अस्पताल और हवाई अड्डे हैं जिनके बारे में हम सबके मन में अनेकों सवाल हैं। पर संकट की इस घड़ी में अब तक ये सब जिस तरीके से खड़े हुए हैं वह अद्भुत और  सराहनीय है।

ये सही है कि जिस तरीके से भारत ने अभी तक कोरोना वायरस के संक्रमण  को नियंत्रित किया है वह तारीफ के लायक है। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि इस अनजान शत्रु से युद्ध का यह पहला ही मोर्चा है। अभी भारत कोरोना वायरस संक्रमण के पहले ही दौर में है।  लेकिन इस पहले दौर में भारत के डॉक्टरों , अस्पतालों, स्वास्थ्य सेवा अधिकारियों, कर्मचारियों, वैज्ञानिकों और भारत के राजनीतिक तथा प्रशासनिक नेतृत्व ने अब तक अच्छा काम किया है।  भारत अब कोरोना संक्रमण के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है जो इसका द्वितीय चरण होने वाला है। जिसमें कम्युनिटी  यानि सामुदायिक संक्रमण  का सबसे ज्यादा खतरा  है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरीके से भारत  ने अभी तक इसका सामना किया है आगे भी उसी तत्परता,  उसी तेजी और उसी सक्रियता के साथ भारत का प्रशासनिक तंत्र, डॉक्टर, अस्पताल, सरकारी और निजी संस्थान तथा  लोग इसका सामना करेंगे।

एक बात तो कहनी ही चाहिए कि भारत के शीर्ष नेतृत्व ने कोरोना वायरस के खतरे को एक चुनौती के रूप में स्वीकार करके उसे एक अवसर में बदला है। उन्होंने सिर्फ भारत के राज्यों और मुख्यमंत्रियों को ही विश्वास में नहीं लिया बल्कि पुराने गिले शिकवे छोड़कर  पड़ोसी देशों को भी साथ मिलाया। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी प्रोटोकॉल या राजनयिक औपचारिकता  की परवाह किए बगैर दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक बुलाई। ये बैठक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई।  जिसमें अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और  बांग्लादेश के शीर्ष नेतृत्व ने हिस्सा लिया। सिर्फ पाकिस्तान से वहां के प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति नहीं बल्कि वहां के स्वास्थ्य मंत्री इस बैठक में रहे। पाकिस्तान ने तो इस संकट की घडी में भी राजनीति की और इस संजीदा मीटिंग में कश्मीर का मामला उठाने की कोशिश की। कुछ भी हो,  जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने दक्षिण एशिया के देशों को इकट्ठा किया वह उनकी तत्परता, कूटनीतिक समझ और और नेतृत्व शैली को दर्शाता है। भारत  ने इस विकट महामारी से लड़ने के लिए दक्षिण एशिया  एक साझा कोष बनाने का भी प्रस्ताव किया। भारत की ओर से इस फंड में एक करोड़ डॉलर के अंशदान की पेशकश भी की गयीं।

दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन यानि सार्क के मंच को इस आपदा के लिए पुनर्जीवित करना एक सही कदम है। क्योंकि संक्रमण और बीमारी देश की सीमाओं के मोहताज नहीं है। दक्षिण एशिया की भौगोलिक - राजनीतिक संरचना ऐसी नहीं है कि कोई एक देश कोरोना से सिर्फ अकेले अपने आप को बचा सके सके।

 30 जनवरी को भारत में कोरोना संक्रमण का पहला मामला सामने आया था तब से अब तक लगभग 7 सप्ताह हो चुके हैं।  इन 7 सप्ताह में कोरोना से संक्रमित मरीज़ो की संख्या 147  है जो कि बाकी देशों में संक्रमण फैलने की औसत से कम है। अगर पड़ोसी देश पाकिस्तान को देखें तो वहां तकरीबन 243 मामले अबतक सामने आ चुके हैं। जहाँ भारत ने इससे लड़ने के लिए तकरीबन पूरी तालाबंदी कर दी है। पर पाकिस्तान अभी तक जैसे कि सो  ही रहा है। उधर चीन से तो ये बीमारी पैदा हुई ही थी। ईरान में भी संक्रमण रुक नहीं रहा। अमेरिका 6524 लोग कोरोना पीड़ित हैं और 116 अमरीकियों की ये महामारी जान ले चुकी है।  यूरोप के देशों की हालत तो और भी खराब है। इटली तो संकटग्रस्त है ही, इंग्लैंड में भी  अबतक 1950 लोग संक्रमित हो चुके हैं और 71 मारे जा चुके हैं।

लेकिन अब हम क्रिटिकल फेज़ यानि संक्रमण के लिए बेहद नाज़ुक दौर में प्रवेश करने जा रहे हैं। लेकिन अब तक देख कर ऐसा लगता है कि भारत में  इंसानियत के इस अनजान दुश्मन को हराने की कूबत है। ये तो मालूम पड़ गया कि भारत के सिस्टम में काम करने का एक नया जज्बा है।  इस संकट ने यह दिखाया है कि पुरानी व्यवस्था को अगर सही दिशा मिल जाए तो भारत वह हासिल कर सकता है जिसके बारे में दुनिया कभी कल्पना भी नहीं कर सकती। भारत ने अबतक  सचमुच में ऐसा ही किया है। हमारे  डॉक्टर, वैज्ञानिक, चिकित्सा कर्मियों के साथ  स्वास्थ्य मंत्री डा हर्षबर्धन, विदेश मंत्री जयशंकर और भारत के प्रधानमंत्री मोदी इस सब के लिए बधाई के पात्र हैं।  आगे आने वाले दिनों में हर हिंदुस्तानी को बेहद सतर्कता और सावधानी बरतने की ज़रुरत है। उम्मीद ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि हम इस बड़े संकट से पार पा ही लेंगे।

Monday, March 2, 2020

दिल्ली को इस्लामाबाद बनाना चाहते हैं शाहीनबागी!





दिल्ली के शाहीन बाग में धरना चलते हुए 2 महीनों से अधिक का वक्त बीत चुका है। इतने वक्त में दिल्ली ने बहुत कुछ सहा है। दिल्ली की हालत और हालात पर कभी फिर बात करेंगे, आज बात शाहीनबागियों की। आखिर शाहीन बाग में सड़क पर  बैठे लोगों की मंशा क्या है? यह चाहते क्या हैं? इस पर थोड़ा विस्तार से गौर करने की आवश्यकता है। दिल्ली ने इस तरह के धरने पहले कभी नही देखे। पर हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों में यह आम बात हो गई है। पाकिस्तान में सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए कट्टर जिहादी तत्व इस तरह के धरने लंबे समय से देते आए हैं।

तहरीक-ए-लब्बैक नाम के संगठन ने 2018 में धरना दे कर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को पंगु बना दिया था। 2017 में भी तहरीक-ए-लब्बैक उर्फ रसूल अल्लाह ने एयरपोर्ट और रावलपिंडी जाने वाले इस्लामाबाद एक्सप्रेस वे और मुर्री रोड को जाम कर दिया था। दोनों ही धरनों के बाद तत्कालीन पाक सरकारों ने उनकी बातें मानी थी। एक बार तो एक केंद्रीय मंत्री तक को हटा दिया गया था। इन प्रदर्शनकारियों के सिर पर पाकिस्तानी फौज का हाथ बताया जाता है। जो पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार से हिसाब चुकता करने के लिए इस तरह के कट्टर जिहादी संगठनों को खुले आम बढ़ावा देती है। यहां तक कि पाक फौज के आला अफसर तहरीक-ए-लब्बैक के लोगों को पैसे बांटते हुए तक पाए गए गए थे । तहरीके लब्बैक के खादिम हुसैन रिज़वी के तरीकों को कुछ लोग अब हिंदुस्तान में आज़मा रहे हैं। ये भी भारत की चुनी हुई सरकार को ना मानने पर अड़े हैं। 

आप कहेंगे कि इस्लामाबाद और दिल्ली के धरनों में क्या समानता है। दोनों में खास बात यह है कि बुनियादी तौर पर दोनों धरने वहां कि विधि सम्मत स्थापित सरकारों के खिलाफ हो रहे थे। पाकिस्तान में तो धरने नवाजशरीफ सरकार के खिलाफ हुए थे पर दिल्ली में धरना भारत की संसद द्वारा लंबी बहस के बाद बहुमत से पारित एक कानून को बदलवाने के लिए हो रहा है। दिल्ली और इस्लामाबाद के धरने जोर जबर्दस्ती से अपनी बात मनवाने की रणनीति है। यह सीधे सीधे ब्लैकमेलिंग है। 'हम जो चाहते हैं वैसा करो' और 'अगर वैसा नहीं होगा' तो हम आम जनजीवन को ठप्प कर देंगे। ज़ोर ज़बरदस्ती से सरकार को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देंगे। यानी कानून द्वारा स्थापित व्यवस्था को नहीं मानेंगे, जरूरत पड़ी तो हिंसा पर भी उतारु होंगे।

शाहीन बाग के धरने का सीधा संबंध दिल्ली के अंदर पिछले हफ्ते हुई व्यापक हिंसा से है। उत्तर पूर्वी दिल्ली में शाहीन बाग की तर्ज पर कुछ लोग धरने पर बैठना चाहते थे। उन्होंने महिलाओं को आगे किया।  जब उन्हें उठाने की, खदेड़ने की कोशिश की गई तो उन्होंने हिंसा का सहारा लिया। शाहीन बाग के धरने और उत्तर पूर्वा दिल्ली के दंगों के पीछे की बुनियादी सोच एक ही है, कि अगर हमारी बात नहीं मानी जाएगी तो हम किसी भी हद तक जाएंगे। चाहे वह  धरने की मार्फत आम जनजीवन ठप्प करना हो या हिंसा का सहारा लेना। मकसद एक ही है ब्लैकमेलिंग। दोनों में सोच के तौर पर कोई फ़र्क़ नहीं। अन्तर सिर्फ विरोध के तरीके का ही है।



पाकिस्तान में तो साफ है कि चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने का काम वहां की फौज किया करती है। पर हिंदुस्तान में इस धरना ब्लैकमेलिंग के पीछे कौन सी ताकतें काम कर रही हैं? हाशिए पर जा चुके अल्ट्रा लेफ्ट और कट्टर जिहादी इस्लामिस्ट, आपको साफ तौर पर इस धरना ब्लैकमेलिंग के पीछे नजर आ जाएंगे। हिंदुस्तान में दोनों ही अपने को साबित करने के लिए झटपटा रहें हैं। और जाने अनजाने इनका साथ दे रही है अपनी पहचान के लिए जूझ रही कांग्रेस। दुनिया भर में लेफ्ट के पांव पूरी तरह से उखड़ चुके हैं। उनके विचार के समर्थक अब कम ही बचे हैं। सीएए  के मुद्दे पर उन्हें लगा कि मुसलमान ही एक ऐसी कौम है जिसे आसानी से उकसाया जा सकता है। इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ मिलकर इस लेफ्ट ने एक नई रणनीति बनाई। ये रणनीति है  धरना ब्लैकमेंलिग की।



अब भारत कोई पाकिस्तान तो है नही कि यहां इस्लामी कट्टरपंथ के लिए समर्थन मिल जाए। इसलिए धरना-ब्लैकमेलिंग के लिए इन कट्टरपंथियों ने हथियार के तौर पर चुना है सविंधान को। क्योंकि इस ब्लैकमेलिंग को सर्व साधारण का समर्थन तभी हासिल हो सकता था जब यह सविंधान के दायरे में नजर आए। ब्लैकमेलिंग को तिरंगे के आवरण में लपेट कर जनता के सामने पेश किया गया। सविंधान और तिरंगे में भारतीयों की आस्था की वजह से देशवासियों को आसानी से बरगलाया जा सकता है। सविंधान और तिरंगा इन इस्लामिस्ट और लेफ्ट अतिवादियों के लिए अपने आखिरी मकसद को पूरा करने का औज़ार मात्र हैं। इनके लिए संविधान और  तिरंगा आस्था का विषय कभी नहीं रहा। इनका तो मकसद ही संविधान को उखाड़ फेंकना है।  इनका अंतिम मकसद एक ही है भारत के टुकड़े करना।



"जिन्ना वाली आज़ादी' के नारे भी शाहीन बाग के मंच से कई बार उछले। 'तेरा मेरा रिश्ता क्या, ला इलाहा इलल्लाह', या 'पाकिस्तान का मतलब क्या , ला इलाहा इलल्लाह,  इन नारों को भारत में लगाने का मतलब क्या है?  ये नारे तो भारत के विभाजन के नारे है। दरअसल शांतिपूर्ण ब्लैकमेलिंग के लबादे में धरने के वक्त ही कई सुराख नजर आने लगे थे। लेफ्ट के नुमाइंदे और शाहीन बाग के धरने के आयोजकों में से एक सरजिल इमाम ने तैश में आ कर नॉर्थ ईस्ट को भारत से काट फेंकने की अपनी पूरी प्लानिंग ही खोल दी। वहीं मुल्लाओं की पार्टी मजलिस-ए-एत्तेहादुल-मुसलमीन के नेता वारिस पठान ने 100 करोड़ हिंदुओं को देख लेने की खुली धमकी दे डाली। किसी ने हिंदुओं के खुले आर्थिक बहिष्कार की घोषणा की तो किसी ने चुन चुन कर हिंदुओं के खात्में की बात कही।  कपटपूर्ण शांतिपूर्ण ब्लेकमेलिंग के चोर दरवाजे से निकली इन चिंगारियों ने ही  दरअसल दिल्ली को सुलगा दिया। शाहीन बाग के बाद जाफराबाद, मस्तफाबाद, चांद बाग और ना जाने कहां कहां दिल्ली में यही प्रयोग दोहराए जाने लगे।



जब ये ब्लेकमेलिंग कारगर नहीं हुई तो, उपद्रवियों ने दिल्ली को आग के हवाले कर दिया। शांतिपूर्ण ब्लैकमेलर्स के तौर तरीके बिलकुल साफ है।  महिलाओं की आड़ लो, सविंधान की दुहाई दो, तिरंगा लहराओं, अंबेडकर और गांधी के आगे दीपक जलाओ, हर वो काम करो जो ऐसा लगे कि सविंधान के दायरे में हो रहा है। पर वो जानते हैं कि वो कर क्या रहे हैं। वो कई लाख लोगों की जिंदगी नरक बना रहे हैं। वो देश को राजनीतिक अस्थिरता का शिकार बना रहे हैं उसे आर्थिक रूप से कमजोर कर रहे हैं। यानी बात मानी तो ठीक, नही तो पूरे देश को यह ब्लैकमेलर्स बंधक बना लेंगे आग के हवाले कर देंगे। इन लोगों ने देश की अदालतों के दावपेंचों का भी खूब इस्तेमाल इस दौरान किया। देश का सुप्रीम कोर्ट तक इनके झांसे में आ गया।



सवाल उठता है कि अल्ट्रा लेफ्ट एक ऐसी विचारधारा है जिसका वजूद मिटने को है। तो फिर यह इतनी मजबूत कैसे हो गई कि इसने पूरे देश को ही बंधक बना लिया। दरअसल नागरिकता कानून पर अफवाह फैला कर इन्होने आम मुसलमानों को बरगलाया और जिहादी इस्लामिस्ट से गठजोड़ बना लिया। मोदी विरोधी मीडिया का एक बड़ा वर्ग और विपक्षी इनके साथ हो गए। सीएए  पर एक फरेबी नेरेटिव तैयार किया गया जिसमें लोग बहक गए। आम भारतीय मुसलमान को समझना होगा कि अल्ट्रा लेफ्ट और कट्टर मुल्लाओं का आपस में याराना है। ये दोनों ही उसके हितैषी नहीं है। कट्टर मुल्ला उसे गजवा-ए-हिंद का सपना दिखाते हैं और अल्ट्रा लेफ्ट उस भारतविरोधी सपने को सविंधान का मुल्लमा पहनाते हैं। वो इस ब्लैकमेलिंग को इंटेलेक्चुअल सपोर्ट प्रदान करते हैं। मुसलमानों को समझना होगा कि यह देश उनका है।  वो पहले भी भारतीय है और बाद में भी। उन्हें अपनी चुप्पी तोड़नी होगी। अल्ट्रा लेफ्ट और इस्लामी कट्टरपंथियों को उनकी औकात बतानी होगी। उन्हें बताना होगा कि वे कोई जर खरीद गुलाम नही हैं। सबसे पहले मुसलमानों को अपने को इन ब्लैकमेलर्स के चंगुल से छुड़ाना होगा। अगर मुसलमान इन की गिरफ्त से बाहर आ गया तो देश अपने आप बाहर आ जाएगा।  


उधर सरकार को भी ध्यान रखना होगा कि वह उस तरह से सोती न रह जाये जैसा कि दिल्ली के दंगों के समय हुआ। यह कोई आम कानून व्यवस्था का सवाल नहीं बल्कि एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है। उसे ज़रूरी समझदारी, बल और कड़ाई से इन लोगों से निपटना चाहिए। भारत में कानून का राज्य है। संविधान नागरिकों को विरोध करने का अधिकार तो देता है। पर यह अधिकार असीमित नहीं है। कोई कहीं भी झंडा और डंडा गाड़कर विरोध नहीं कर सकता। ये  विरोध संसद और विधान सभाओं में हो सकता है , अदालतों में हो सकता है। पर सड़कों और सार्वजनिक स्थानों  पर ऐसी अराजकता संविधान और कानून सम्मत नहीं है। शाहीन बागियों और दंगाइयों को दिल्ली को इस्लामाबाद बनाने की इस साज़िश में कामयाब नहीं होने दिया जा सकता।

Sunday, February 2, 2020

नींव की नई ईंटें लगाता भारत

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जब नीव की ईट लगाई जा रही होती है तो उस पर बहुत लोग ध्यान नहीं देते। पर असली बात तो यह है कि जिस नीव की ईट को जमीन के अंदर दफन कर दिया जाता है उसी की मजबूती पर ही कोई भवन टिका रह सकता है। जो कंगूरे हमें भवन की प्राचीर पर दिखाई देते हैं उनकी सुंदरता, उनकी रमणीयता और उनका टिकाऊपन निर्भर करता है कि नीव की ईट कितनी मजबूत और कितनी गहरी है। ये बात सिर्फ एक इमारत पर ही नहीं बल्कि एक राष्ट्र पर भी लागू होती है। कोई देश कितना कितना मजबूत होगा और वह कितना आगे जायेगा यह निर्भर करता है कि उसकी बुनियाद के सिद्धान्त और निर्णय कितने ठोस और साहसपूर्ण हैं।

इस देश की आजादी के 70 साल बाद आज कुछ बुनियादी और आमूल परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों की गंभीरता और उनका दूरगामी प्रभाव शायद आज हमें उसी तरह से दिखाई नहीं दे जैसे कि नींव की ईंटें होती हैं। लेकिन भारत की दुनिया में जो हैसियत है और जो आगे भी छवि देश की बनेगी उसके लिए ये परिवर्तन बेहद दूरगामी हैं। असल में देखा जाए तो एक बिल्कुल नया भारत उभरता हुआ दिखाई देता है। पिछले कोई 5 -6  बरस के सरकार के फैसलों और अंतर्राष्ट्रीय कदमों को हम लें तो उनमें एक निरंतरता और नई सोच नज़र आती है। इन क़दमों ने भारत की विदेश और रक्षा नीति की यथास्थितपरक जड़ता को तोड़ा है। इस कारण कई बार इसकी प्रतिक्रिया में कुछ उद्वेलन सा भी दिखाई देता है जो स्वाभाविक ही है। नागरिकता कानून में संशोधन के बाद अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और अंदरूनी शोर को इसी नज़रिये से देखा जा सकता है। 

पहले भारत को माना जाता था एक सॉफ्ट देश है। ऐसा देश जिसके खिलाफ कुछ भी कहा जा सकता था और  कुछ भी किया जा सकता था। पहले यह देश कुछ बयान देकर चुप हो जाता था। उन बयानों को भी दुनिया सुना अनसुना कर देती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है।  एक के बाद एक उदाहरण आप देखें तो आपको नज़र आएगा कि देश अपने आप को नए तरीके से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है। मानो, ये दुनिया को कह रहा है कि भारत को हल्के में मत लेना। बात सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक या बालाकोट के हमलों की ही नहीं है । जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35 ए को निष्प्रभावी बनाने से लेकर नागरिकता कानून में संशोधन और रूस से एस 400 मिसाइल सिस्टम को खरीदने तक के कदम बताते हैं कि भारत अपनी एक नई इबारत लिख रहा है। 

यहाँ नागरिकता कानून को लेकर मौजूदा उदाहरण को देना आवश्यक होगा। अचानक से यूरोपीय यूनियन की संसद में भारत के नागरिकता कानून पर एक प्रस्ताव आया। ये प्रस्ताव पाकिस्तान समर्थक वामपंथी विचारधारा वाले यूरोपीय सांसदों ने यूरोप की संसद में रखा। इस प्रस्ताव में भारत के नागरिकता कानून के बारे में सचमुच अनर्गल प्रलाप  किया गया था। इस प्रस्ताव पर बहस के बाद मतदान का प्रावधान था। पहले का भारत होता तो इस पर शायद विदेश मंत्रालय कुछ बयान देकर रह जाता।  इस बार ऐसा नहीं हुआ। सबसे पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने यूरोपीय संसद के अध्यक्ष डेविड सिसौली को ने एक पत्र लिखा। उन्होंने इस पत्र में  कहा कि आप इस पर बहस करके मतदान करेंगे तो फिर समझ लीजिए एक नई और खतरनाक परिपाटी की शुरुआत होगी। इसका अर्थ हुआ कि कोई भी देश दूसरे देश की संसद के प्रस्तावों पर बहस कर सकता है। श्री बिड़ला ने लिखा कि यह लोकतंत्र के सिद्धांतों और मर्यादाओं का उल्लंघन होगा।  लोकसभाध्यक्ष को इस न्यायोचित, तर्कसंगत, लोकतान्त्रिक समझदारी से परिपूर्ण इस पत्र के लिए धन्यवाद दिया जाना चाहिए। लेकिन भारत इस पत्र पर ही नहीं रुका। देश के राजनयिकों ने यूरोपीय संसद के मुख्यालय ब्रुसेल्स में कूटनीतिक दबाव बनाया और यूरोप की संसद को यह बात समझ में आई कि इस पर मतदान करना उचित नहीं होगा। इस उलजलूल प्रस्ताव पर मतदान टाला गया। 

इसी तरह मलेशिया का मामला भी लिया जा सकता है जहाँ भारत ने अपने हितों की रक्षा के लिए अपने बाज़ार की ताकत का कुशलता के साथ उपयोग किया। मलेशिया के 94 वर्षीय प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद आजकल पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं। मलेशिया, तुर्की और पाकिस्तान मिलकर एक नया इस्लामिक गुट बनाना चाहते हैं। इसके लिए जम्मू कश्मीर और नागरिकता संशोधन कानून पर  महातिर मोहम्मद ने भारत को निशाना बनाया। पहले वाला भारत शायद  इस मामले में बयानबाज़ी तक सीमित रहता।  इस बार भारत ने दिखाया कि वह अपने खिलाफ किए जाने वाले किसी भी दुष्प्रचार दूर करने के लिए किसी भी हद तक जाएगा। मलेशिया से बड़ी मात्रा में पाम आयल हमारे देश में आता है। भारत ने अनौपचारिक तौर से मलेशिया से आने वाले पाम ऑयल के आयात पर कटौती कर दी इससे मलेशिया की गहरी आर्थिक हानि हुई। पाम आयल का बाज़ार टूट गया। परिणाम हुआ कि मलेशिया घुटनों पर आ गया। जो महातिर मोहम्मद कल तक बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे अब कहने लगे हैं कि हम भारत जैसे बड़े देश से पंगा नहीं ले सकते। इसी तरह हमें याद रखना चाहिए कि जब डोकलाम में चीन ने हमारे धैर्य की परीक्षा लेने की कोशिश की तो हमने आंख में आंख मिलाकर  चीन को बताया कि इस तरह की दादागिरी नहीं चलेगी।

और तो और व्यापार के मामले में हमने अमेरिका से भी साफ-साफ बात की। रूस से हथियार मंगाने के मुद्दे पर अमेरिका ने हमें चेतावनी दी हमें कहा कि अगर हम रूस से मिसाइल सिस्टम मनाएंगे तो हमें नुकसान होगा। अमेरिका से दोस्ती भारत लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इस मामले पर उसे भारत ने बता दिया कि हमारे राष्ट्रीय हित में जो फैसला होगा हम करेंगे। इस पर हम किसी की नहीं सुनेंगे।  अमेरिका को इस पर पीछे हटना पड़ा।   

इसके अलावा भी बहुत से कदम ऐसे हैं लगता है कि यह भारत एक नया भारत है जिसकी बुनियाद में आत्मविश्वास है, अपनी शक्ति के प्रति जिम्मेदारी है, अपने स्वाभिमान का आभास है और दुनिया में अपनी भूमिका क्या होने वाली है इसकी सजग अनुभूति है। लेकिन देश किसी मुगालते में नहीं रह सकता।  भारत के इन नये क़दमों का विरोध होगा। हो भी रहा है। परन्तु इस विरोध के भय से देश उन क़दमों को पीछे नहीं खींच सकता जो भविष्य के नए भारत की भव्य इमारत की आधारशिला हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तिया यहाँ खूब सटीक बैठती हैं:
स्वातंत्र्य गर्व उनका, जिनपर संकट की घात न चलती है,
तूफानों में जिनकी मशाल कुछ और तेज़ हो जलती है ।
लक्षमण-रेखा के दास तटों तक ही जाकर फिर जाते हैं,
वर्जित समुद्र में नाव लिए स्वाधीन वीर ही जाते हैं ।

Sunday, January 5, 2020

कैसा था 2019?



अगर 2019 को एक उक्ति या दोहे में समाहित किया जाए तो मैं कबीर दास जी का यह दोहा कहूंगा :
धीरे धीरे रे मना, सब कछु धीरे होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।।
इसका अर्थ है कि सारी चीजें समय के अनुसार होती हैं। हमारे मन में कितनी भी जल्दी क्यों न हो, चीजें अपना नियत वक्त लेती ही हैं। जैसे, माली एक पेड़ में कितना ही पानी क्यों ना दे, पेड़ में फल तो तभी लगेगा जब उसका मौसम होगा। माली के ज्यादा पानी देने से फल जल्दी नहीं लग सकता। इसको दूसरी तरह से भी देखा जा सकता है। जब हम कोई नई इमारत खड़ी करते हैं - कोई नया भवन बनाते हैं तो शुरू शुरू में उसमें बहुत सारा सामान लगता है। मेहनत लगती है। शुरू में वैसा दिखाई भी नहीं देता कि जैसा वो भवन बाद में बनेगा। ये इमारत अगर आप पुरानी इमारत के ऊपर बना रहे हैं तो और भी मुश्किल होती है। जब पुरानी इमारत के ऊपर नई इमारत बनती है तो कुछ तोड़फोड़ होती है। कुछ मलबा गिरता है। कुछ शोर-शराबा होता है। गर्द गिरती है। धूल उड़ती है। उसमें समय लगता है। उसके बाद ही एक नया भवन - एक नई इमारत खड़ी होती है।  2019 के साल को ऐसे ही देखा जाना ठीक होगा। 

इस दौरान कुछ मूल बातों की आधारशिला रखी गई। ये नींव है समाज में सभी के लिए संविधान सम्मत सम्मान, न्याय, इंसाफ, बराबरी पर आधारित व्यवस्थाओं की। ऐसा नहीं है कि 2019 से पहले ऐसा  नहीं था। लेकिन 70 साल पुरानी जो हमारे देश की व्यवस्थागत इमारत थी उसमें वक़्त और व्यवहार के साथ साथ खामियां आ गयीं थी।  उनमें सही बदलाव की जरूरत थी। इसके लिए 2019 में जो उपाय किए गए उनपर हलचल होना सहज और स्वाभाविक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है। जिसकी प्रतिध्वनि हमें  मीडिया में दिखाई देती है। इसे यदि राजनीतिक चश्में और सियासी बहस से देखें तो रंग अलग नज़र आएगा। असली बात यह है कि 2019 का साल नई इमारत की नींव और नई व्यवस्था की इबारत लिखने का साल था। इसे आप राजनीतिक दृष्टिकोण और विचारधाराओं की दृष्टि को दूर रखकर, भारत के नजरिए से देखेंगें तब ही आप सही निष्कर्ष पर पहुँच पायेंगे।

इस बुनियादी  बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई  2019 के आम चुनाव से। एक लम्बे अर्से  बाद ऐसा हुआ कि केंद्र में एक सरकार को अपने काम के आधार पर सकारात्मक वोट मिला। अपने बलबूते पर एक पार्टी को बहुमत मिला। एक साल के भीतर सरकार ने जो फैसले लिए - सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक व्यवस्था,  प्रशासनिक तंत्र,  राजनीतिक ढांचे को लेकर - वे खासे बुनियादी हैं। भारत की पुरानी पड़ी समस्याओं को उठाये गए कदम और फैसले  बड़े दूरगामी हैं। इनकी राजनीतिक मीमांसा में जाए बिना यह तो कहा जा सकता है कि इन फैसलों ने यथास्थितवाद यानी 'स्टेटस को' को तोड़ा है।

सबसे पहले जम्मू कश्मीर के फैसले की बात करते हैं। जम्मू कश्मीर में भारत 70 साल से सिर्फ एक रक्षात्मक मुद्रा में था। हमारी कश्मीर नीति सिर्फ पाकिस्तान का जवाब देने की थी। चाहे वो 1948 या 1965 के आक्रमण हों या फिर पिछले दो दशक से चल रहा आतंकी खेल। हम सिर्फ पाकिस्तान की हरकतों से अपने को बचाने की जुगाड़ में ही लगे रहे हैं। इस यथास्थितवाद से निकल कर नया सोचने की ज़रूरत थी जो इस बार  सरकार ने किया। इस बार एक बुनियादी परिवर्तन करके धारा सिंह 370 को समाप्त किया गया।  जम्मू कश्मीर राज्य का पुनर्गठन किया गया। लद्दाख को उसके हक दिए गए। जम्मू और कश्मीर  पुनर्गठन करने पर विरोधी यह कहते रहे कि इसके बाद न जाने क्या हो जायेगा ?

यह तो पता नहीं कि आगे क्या होगा पर ये फैसला अगस्त में हुआ था। 5 महीने बाद अगर आप देखें तो वहां की स्थिति पहले से बेहतर है। अभी पिछले दिनों ही  खबर आई कि वहां से सुरक्षाबलों की 72 कंपनियां हटाई जा रहीं हैं। इसका मतलब जमीन पर हालात नियंत्रण में हैं। उम्मीद है कि इससे जम्मू कश्मीर के तीनों हिस्से - जम्मू , कश्मीर और लद्दाख - में समुचित विकास होगा। हर वर्ग को तरक्की के अवसर मिलेंगे। वहां जो पिछड़े लोग हैं उनके साथ अन्याय हो रहा था - उनको बराबरी के अधिकार मिलेंगे। मैं यह नहीं कहता कि जम्मू कश्मीर से आतंकवाद तुरंत समाप्त हो जाएगा। ये एक लंबी लड़ाई है जो भारत को आगे शायद एक दशक तक और लड़नी पड़ेगी। परन्तु आज पाकिस्तान के हाथ से निकलकर पहल भारत के हाथ में आ गयी है। जम्मू कश्मीर में एक नई इबारत लिखी गई है। दशकों से रिस रहे घाव का एक ऑपरेशन हुआ है जिसके अच्छे परिणाम होने की उम्मीद है।

अब हम दूसरे फैसले पर जाते हैं।  वह फैसला आया तो न्यायपालिका लेकिन जल्दी फैसला लेने के लिए सरकार ने गुहार लगाई। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मामले का फैसला दूरगामी निर्णय है। वह फैसला विवादों की एक बड़ी श्रृंखला पर विराम लगाता है। अदालत में यह स्थापित हुआ कि जहां रामलला विराजमान है वहीँ पर श्री राम का जन्म हुआ था। अदालत ने सही फैसला किया कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो।  ये विवाद कई सौ साल से चल रहा है। इसके लिए कई संघर्ष हुए और लाखों लोग बलिदान हुए।  सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद पर न्यायोचित,  तथ्य सम्मत,  ऐतिहासिक/पुरातत्व संदर्भों पर आधारित और साथ ही  सभी पक्षों के लिए सम्मानजनक  फैसला दिया। यह फैसला समाज को आगे ले जाने वाला है।

एक और फैसला संसद ने किया और वह था तीन तलाक की कुप्रथा को समाप्त करने का। यह महिला अधिकारों का सवाल था। सोचिये देश की लाखों महिलाओं को ऐसे भेदभाव पूर्ण कानून के सहारे छोड़ दिया गया था जो ज़्यादातर इस्लामी देशों में भी लागू नहीं है। संविधान प्रदत्त इस समानता को लागू करने के लिए एक दृढ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत थी। कठमुल्लापन के ब्लेकमैल से बिना दबे केंद्र सरकार ने एक साहसपूर्ण फैसला किया। ऐसी ख़बरें हैं हैं कि बहुत सारी मुस्लिम महिलाएं अपने हक और सम्मान के लिए अब अदालतों में जा रही हैं।

एक फैसला जिस पर खून चर्चा और विवाद किया जा रहा है वह है  नागरिकता कानून में संशोधन का। इसका ज़्यादा विरोध भ्रम और नासमझी के कारण हो रहा है। ये भ्रम भी जानबूझकर कर  फैलाया जा रहा लगता है।  संशोधन के तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में मज़हबी कारणों से प्रताड़ित हिन्दू, जैन, सिख, बौद्ध, ईसाई और पारसी मत मानने वालों को भारत की नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है। इन तीनों ही देशों का सरकारी मजहब इस्लाम है। इस कारण वहां गैर इस्लामी लोगों के साथ  अन्याय, अत्याचार, प्रताड़ना और धर्म परिवर्तन सामान्य बात है।  यह कानून कहीं नहीं कहता कि इन देशों के सारे अल्पसंख्यक भारत आ जाएं और उन्हें नागरिकता दी जाएगी। इस कानून में व्यवस्था यह है कि वहाँ सताए हुए जो अल्पसंख्यक भारत आ चुके हैं और जिन्हें नागरिकता के अधिकारों से वंचित रखा गया है, उन्हें नागरिकता दी जाए। अब ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि भारत में रहने वाले मुसलमानों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। जो भी आज भारतीय नागरिक हैं चाहे वे किसी मजहब  क्यों न मानते हों, उनका इस कानून से कोई  लेना देना नहीं है। मुझे लगता है कि थोड़े दिनों बाद ये मौजूदा हंगामा ख़त्म हो  जाएगा। लोगों को समझ आएगा कि  यह संशोधन भेदभाव पूर्ण नहीं है बल्कि हमारे पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों के साथ जो भेदभाव हो रहा है उनके अधिकारों संरक्षण के वास्ते है।

2019 का साल राजनीतिक दृष्टि से भी मुझे लगता है कि महत्वपूर्ण साल है एक तो यह कि आम चुनावों में नरेंद्र मोदी सरकार दोबारा से सत्ता में आ गई। कई राज्यों में भी सत्ता का परिवर्तन हुआ।  झारखंड, महाराष्ट्र , असम, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि अनेक राज्यों में नयी सरकारें आईं। राजनीतिक दलों के नज़रिये से अगर बाहर निकल कर आप देखें तो आपको लगेगा कि यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और भारत के मतदाताओं के आत्मविश्वास को दिखाता है।  आम चुनावों के दौरान और उसके बाद भी चुनाव प्रक्रिया को लेकर एक भ्रम पैदा करने की शरारतपूर्ण कोशिश की गयी। भ्रम पैदा किया गया। यह भ्रम फैलाया गया कि  ईवीएम सही नहीं है और चुनाव बैलेट से होना चाहिए। मुझे तो इसको देखकर हंसी ही आती है कि हम इंटरनेट के जमाने में यह बात कह रहे हैं कि पुराना लैंडलाइन जिसमें उंगली से नंबर घुमाया जाता था उस पर दोबारा वापस जाया जाए। जानबूझकर कर ये भ्रम फैलाने की कोशिश की गई ताकि भारत की जो परिपक्व लोकतांत्रिक प्रक्रिया है उस पर संदेह किए जा सके। ये शक सिर्फ प्रक्रिया पर ही नहीं बल्कि जनादेश पर खड़ा किया गया। ये शक पैदा करने वाले भारत तोड़ो गैंग के हाथ में ही खेल रहे थे। लेकिन उसके बाद एक के बाद एक राज्यों में हुए चुनावों ने झूठ के इस गुब्बारे की हवा हमेशा के निकाल के रख दी। 

एक चीज से और प्रसन्नता मिलती है वह है  चुनावी राजनीतिक प्रक्रियाओं के दौरान देश में नए खून का आगे आना। ये नया नेतृत्व अगले 40 50 सालों तक भारत को आगे ले जायेगा। पिछले दिनों लद्दाख के युवा सांसद जम्यांग नामग्याल का अद्भुत भाषण सुना। इसी लोकसभा में चन्द्राणी मुर्मू, तेजस्वी सूर्या, मिमी चक्रवर्ती, नुसरत जहाँ और रेखा खड़से जैसे युवाओं का चुनकर आना बहुत अच्छा है। ऐसे ही आगे आये राज्यों में सत्ता संभालने वाले महाराष्ट्र के आदित्य ठाकरे, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, असम के मुख्यमंत्री  सोनोवाल, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देव, हरियाणा के उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला - एक के बाद एक एक युवा नेतृत्व अलग-अलग पार्टियों में उभरता दिखाई देता है। यह देश को आगे ले जाने वाले लोग हैं। इनका ध्यान रखना, इनकी सही ट्रेनिंग होना बहुत आवश्यक है। एक ही चीज थोड़ी खलती है वो ये कि देश की  सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इस प्रक्रिया में थोड़ा पीछे रह गयी लगती है। ये पार्टी मध्यप्रदेश और राजस्थान में नए प्रयोग कर सकती थी।

जब नया खेत तैय्यार होता है तो पहले उसमें हल चलाया जाता है। खरपतवार निकाला जाता है। जमीन को मुलायम बनाया जाता है। फिर उसमें बीज डाले जाते हैं। और वह बीज अगर अच्छे हैं तो बड़ी अच्छी फसल होती है। शुरू में किसान को नयी पौध की रखवाली भी करनी होती है। इस नाते 2019 का साल नया खेत तैयार करके उसमें नए बीज डालने का साल था।  अर्थतंत्र,  राजनीतिक तंत्र, प्रशासनिक तंत्र, सैन्य तंत्र इत्यादि हर व्यवस्था में नए-नए बीज डाले गए है। आगे आने वाले साल इन बीजों के पुष्पन-पल्लवन के होंगे। 2019 का साल देश के लिए एक बड़ा अर्थपूर्ण साल था।  2020 का साल खेत की रखवाली और नव पादपों की देखरेख का साल होगा। उम्मीद है कि 2020 के बाद देश और अधिक ऊर्जावान, क्षमतावान, समतायुक्त, समरस, सशक्त तथा संपन्न होकर निकलेगा। नए साल का यही संकल्प और कामना है।