Monday, June 1, 2020

आपदा और राजा का धर्म





जब किसी देश पर कोई विपत्ति आती है तो राजा का और आज के संदर्भ में सत्तासीन नेताओं का जनता के प्रति क्या कर्तव्य है? इस  राजधर्म की बड़ी सुंदर व्याख्या भारतीय वांग्मय में की गयी है।
रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं :
"जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।"
अर्थात जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी होती है उसे नरक मिलता है।
इसी बात को एक और तरह से उन्होंने लिखा है। 
"सोचिअ नृपति जो नीति न जाना, जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।
यानि जो शासक अपनी जनता को अपने प्राण के समान प्यारा नहीं मानता वह सोच करने के लायक है।

राजा के धर्म का निरूपण कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में भी किया है। वे लिखते हैं :
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥ (अर्थशास्त्र 1/19)
अर्थात्-प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में उसका हित है। राजा का अपना प्रिय कुछ नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।
एक अन्य ग्रन्थ में प्रजा को संतान के बराबर बताया गया है।
"पुत्र इव पितृगृहे विषये यस्य मानवाः। निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तम॥"

इन सभी ग्रंथों की उक्तियों का एक ही निचोड़ है कि राजा को जनता का उसी तरह ध्यान रखना चाहिए जिस तरह एक पिता अपने पुत्र की देखभाल करता है। आज के लोकतान्त्रिक सन्दर्भ में इस बात का सीधा अर्थ है - जो शीर्ष पर बैठा हुआ नेता अपनी संतान की तरह लोगों के प्राण, उनकी आजीविका तथा सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता, वह राज्य करने लायक नहीं है।

इसी सिद्धांत को कोरोना संकट और उससे उत्पन्न स्थितियों पर भी लागू किया जाना चाहिए। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कोरोना एक ऐसी बीमारी है जिसका पूर्वानुमान लगाना किसी के लिए संभव नहीं था। जिसकी तैयारी कर पाना किसी के वश में नहीं था। इस छूत की बीमारी से बचने के कोई स्थापित मानक नहीं थे। लेकिन इस विपत्ति के समय एक ही अपेक्षा थी कि सत्तासीन नेता इस पर राजनीति न करें और लोगों को बीमारी से बचाने के लिए और उनकी तकलीफें दूर करने के लिए जो भी मुनासिब हो वो करें।

कोरोना के साथ भारत के अबतक के अपेक्षाकृत सफल युद्ध में दो बड़ी दुर्घटनाएं हुईं हैं। इन घटनाओं ने इस बीमारी के फैलाव और उससे पैदा हुई तकलीफों को और बढ़ा दिया। पहली गंभीर घटना थी  तबलीगी जमात के कारण कोरोना के संक्रमण का जबरदस्त फैलाव। पहले तो ऐसा लगा कि यह इतना बड़ा झटका है जिससे  उबर पाना मुश्किल होगा। पर देश ने बड़े धैर्य, संयम, जहाँ आवश्यक हुआ वहां ज़रूरी सख्ती के साथ इसका सामना किया। मोटे तौर पर तब्लीगी जमात की पोंगापंथी, मूर्खता, जाहिली और दकियानूसी सोच से उत्पन्न इस संकट को ठीक तरीके से हल किया गया।

यह संकट अभी ख़त्म नहीं हुआ था कि दूसरी बड़ी विपदा देश के सामने आ गयी। वह थी देशभर से मजदूरों के पलायन की समस्या।  इस संकट का सामना मेरे विचार से उतनी अच्छी तरह नहीं हुआ जिस तरीके से किया जा सकता था। मजदूरों की एक विकट समस्या सबसे ज्यादा विकराल हुई देश की वित्तीय राजधानी मुंबई तथा देश की राजनीतिक राजधानी दिल्ली में। देश में ज्यादातर मजदूर दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार से आते हैं। आज देश में कोरोना संक्रमण के जितने मामले हैं उनमें से आधे से अधिक इन चार राज्यों - महाराष्ट्र (70013), दिल्ली (20834), उत्तर प्रदेश (8361) और बिहार (3945) में ही हैं। कुछ हद तक यह समस्या गुजरात में भी देखी गई।

सबसे पहले इस समस्या के संकेत दिखाई दिए दिल्ली में। देश में लोकडाउन 25 मार्च को शुरू हुआ था। उसके तीन दिन बाद  28 मार्च को राजधानी दिल्ली में अचानक मजदूरों को संदेश मिला कि उनके जाने के लिए दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर व्यवस्था की गई है। ये बस अड्डा दिल्ली - उत्तरप्रदेश सीमा पर है। कई मोहल्लों में व्हाट्सएप के जरिए व अन्य संचार माध्यमों के जरिए मजदूरों तक यह अफवाह पहुंचाई गई। यह गंभीर जांच का विषय कि किसने राजनीतिक स्वार्थों के कारण यह अफवाह फैलाई। 

मीडिया में छपी खबरों के अनुसार दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं का इसमें हाथ था। पार्टी के विधायक राघव चड्ढा की एक विवादित ट्ववीट भी इस दौरान आई जिसमें कहा गया था कि उतर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मज़दूरों को पिटवा रहें हैं। जबकि यह बात झूठी निकली। लाखों मजदूर जब आनंद विहार बस अड्डे पर पहुंचे तो अफरा-तफरी तो मचनी ही थी। इस घटना के चित्र, खबरें और वीडियो  मीडिया में  छाए रहे। दुनिया में ये संदेश गया कि मजदूर बेहद परेशान है। अब यह जिम्मेदारी हर उस राज्य की थी जहां भी यह प्रवासी मजदूर रह रहे हैं। इन राज्यों को सुनिश्चित करना था कि श्रमिकों की ठीक से व्यवस्था हो। उन में आई हुई स्वाभाविक अनिश्चितता और बेचैनी कम हो। उनके खाने पीने का सही इंतजाम हो। साथ ही उन से रहने की जगहों का किराया ना मांगा जाए। इस सबका उद्देश्य कोरोना के फैलाव को आगे बढ़ने से रोकना था। लेकिन ऐसा लगता है कि इसमें कई जगह कोताही हुई।

उधर 15 अप्रेल को मुंबई में बांद्रा के पास एकाएक कई हजार मजदूर जमा हो गए। उन्हें भी यह बताया गया था कि उनके लिए जाने की व्यवस्था की जा रही है। विनय दुबे नाम के एक कथित सामजिक कार्यकर्त्ता ने सोशल मीडिया पर बाकायदा लोकडाउन के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाया जिसे मुंबई की पुलिस और प्रशासन ने अनदेखा किया। जबकि दिल्ली की घटना के बाद मुंबई को मुस्तैद होना चाहिए था। असल में इस व्यक्ति के साथ नरमी बरती गयी क्योंकि इसके सत्ताधारी नेताओं के साथ नज़दीकी रिश्ते थे। उधर कुछ मीडिया खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने तो यहां तक कहा कि मजदूरों को अपने राज्यों में चला जाना चाहिए।  इस सारे घटनाक्रम से  प्रवासी मजदूरों में खासी बेचैनी फैली। फिर तो हर जगह ऐसी घटनाओं का सिलसिला आरंभ हुआ। गुजरात में भी कई जगह ऐसा हुआ। 

राज्यों ने मज़दूरों की मनःस्थिति समझने में संवेदनहीनता का परिचय दिया। मजदूर गहरे संकट में थे। अधिकतर मजदूर एक साथ छोटे-छोटे कमरों, झोपड़ियों या अस्थायी निर्माणों में रहते है। वे घर से दूर थे। कामकाज बंद हो चुके थे। बेकार श्रमिक बदहाल थे। छोटे छोटे दड़बों में रहने  वाले मजदूरों की मानसिक अवस्था क्या होगी इसे समझा जा सकता है।  उन्हें चिंता रही होगी - अपने घरबार की; उन्हें  रही चिंता होगी अपने काम की; चिंता रही होगी अपनी जान की; उन्हें दूर बसे अपने परिवार की चिंता रही होगी।  यों भी जब पूरी दुनिया में कोरोना के संक्रमण और मौत का मंजर फैला हो तो व्यक्ति अपनों के साथ रहना चाहता है।  इसलिए मजदूरों की दिक्कत समझी जा सकती है।  उसके साथ सहानुभूति होनी चाहिए थी।  जैसा कि हमने ऊपर कहा कि राजा का धर्म होता है अपनी प्रजा की  चिंता संतान की तरह करें। पर महाराष्ट्र, दिल्ली और गुजरात में शुरू के दिनों में स्थानीय नेतृत्व ने ऐसा नहीं किया। 

ऐसा लगा कि महाराष्ट्र और दिल्ली में वहां का स्थानीय नेतृत्व चाहता था कि जितना जल्दी से जल्दी हो ये मजदूर अपने घरों को लौटे। यह एक गैर ज़िम्मेदार सोच थी जो प्रवासी मज़दूरों को अपना नहीं बल्कि दूसरा समझती थी। इसमें अपनत्व नहीं बल्कि फौरी राजनीतिक स्वार्थ का भाव था।  दिल्ली और मुंबई की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में इन प्रवासी लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है। 

प्रवासी श्रमिक भारत के नागरिक हैं।  वे किसी भी राज्य के हों तथा आजीविका के लिए कहीं भी रहते हों, देश के संसाधनों पर उनका उतना ही अधिकार है जितना किसी और नागरिक का। इन्हें वह सब मिलने का हक था जो कि किसी अन्य नागरिक को मिलता है। पर ऐसा नहीं हुआ इसके कारण मजदूरों में दूसरेपन का संदेश गया। इसके कारण पहले से ही एकाकी, क्षुब्ध, परेशान और काम न होने के कारण चिंतित मजदूरों में संदेश गया कि उन्हें घर लौटना चाहिए। इससे  देश में अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया। देश में प्रवासी मज़दूरों की संख्या करोड़ों मे हैं। इन सब की व्यवस्था करना इतना सरल भी नहीं था।  पर न तो इन तक सही संदेश पहुंचाने की व्यवस्था की गई और ना ही समाज के इस अहम हिस्से से संवेदन शील तरीके से संवाद किया गया।

इसके बाद भागमभाग का जो मंजर फैला उसे हमने देखा।  उससे एक अंतर्राष्ट्रीय नेरेटिव बना कि सरकारे तकलीफ में पड़े हुए अपने मजदूरों के प्रति संवेदनशील नहीं है। दुनिया भर के मीडिया में असंख्य सही और गलत स्टोरी इस पर चली हैं। हर स्तर पर अपने देश की व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार है। अभी भी इस पर राजनीतिक बयानबाजी हो रही है जो अत्यंत अफसोसजनक है। इससे नेताओं को बचने की आवश्यकता है। 

इनमें से ज्यादातर प्रवासी मजदूर दो राज्यों  उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं। जहां उत्तर प्रदेश में एक बड़ी हद तक संवेदनशीलता दिखाई,  वही बिहार के नेताओं का आचरण उचित नहीं था।  शुरू में बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में जब बिहार के लोग लौटेंगे तो उसके लिए राज्य तैयार नहीं है। संकट के समय ऐसा बयान उचित नहीं था।  देश के हर नागरिक को अपने घर जाने का अधिकार है।  और बिहार की सरकार को इस तरह का संवेदन हीन बयान नहीं देना चाहिए था।  उधर महाराष्ट्र सरकार का पूरा रिस्पांस भ्रम से भरा हुआ था। ऐसा लगा कि उन्हें पता ही नहीं था कि क्या करना है। पहले तो लोकडाउन को बड़े लचर तरीके से लागू किया गया। मुंबई देश की वित्तीय धड़कन है। वहाँ कोरोना रोकने के लिए जो प्रशासनिक मुस्तैदी चाहिए थी वह नदारद थी। इस प्रशसनिक लचरपन को राजनीतिक बयानबाजी की आड़ में छिपाया नहीं जा सकता। 

शायद राज्य सरकार चाहती थी कि प्रवासी जल्द से जल्द  दूर चले जाएं  और राज्य की समस्या कम हो जाए। पर हुआ उसका उल्टा ही। शुरू के दिनों में महाराष्ट्र में लॉक डाउन को लेकर जो अनिश्चितता बनी उसके कारण वहां परिस्थिति विषम से विषमतर होती गई l आज स्थिति है कि महाराष्ट्र में 70,000 से ज्यादा कोरोना पीड़ित हैं।  महाराष्ट्र और खासकर मुंबई में इसकी तैयारी नहीं है। राजनीतिक रस्साकशी और नेतृत्व की अनुभव हीनता के कारण महाराष्ट्र जैसी सक्षम प्रशासनिक व्यवस्था ऐसे लगता है कि लाचार हो गई है। इससे उलट उत्तर प्रदेश का उदाहरण देखें तो मुख्यमंत्री योगी ने शुरू के दिनों में लोकडाउन में बेहद सख्ती दिखाई और बाद में मजदूरों के प्रति संवेदनशील व्यवहार रखा।  इसी  के कारण शायद वे अपने यहां कोरोना के संक्रमण को काफी सीमित रख पाए है।  उधर गुजरात और तमिलनाडु में भी शुरू में इस समस्या की अनदेखी की गई। वहां भी मजदूरों के संकट को कम करके आंका गया। दिल्ली का हाल भी बुरा है। तीनों राज्यों में कोरोना संक्रमण की स्थिति नाज़ुक हैं।

कहा जा सकता है कि इस विपदा की घड़ी में कुछ राज्यों का नेतृत्व कसौटी पर सही नहीं उतरा।  उसने मजदूरों को तकलीफ में फंसे अपने देशवासियों के रूप में न देखकर एक समस्या के रूप में देखा। उस समस्या को अपने से दूर रखने की कोशिश की। नेतृत्व में ज़रूरी संवेदनशीलता के अभाव से ये समस्या और भी गंभीर हो गयी। नहीं तो हमें देश में ऐसे दृश्य नहीं देखने को मिलते जो आज मीडिया में दिखाई दे रहे हैं।
फिर भी यह कहना पड़ेगा कि भारतीय समाज ने  हर स्थान पर प्रवासी परिवारों से अपनत्व का  व्यवहार किया। हर स्थान पर जिससे जितना संभव हुआ लोगों ने इनके दिक्कते दूर करने के लिए प्रयास किये।  सामाजिक-धार्मिक संस्थानों जैसे गुरुद्वारों, मंदिरों, स्थानीय संस्थाओं, सेवा भारती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा सैकड़ों अन्य छोटे बड़े  संगठनों और व्यक्तिगत तरीके से लोगों ने जितना भी बन पड़ा अपने इन प्रवासी मजदूर भाइयों के लिए किया। खाना, पानी, वाहन, राशन, चिकित्सा  आदि की व्यवस्था की। अगर यह सामाजिक शक्ति भारत में नहीं होती तो यह संकट कितना बड़ा हो सकता था इसकी कल्पना करना भी तकलीफ देह है।

Tuesday, May 5, 2020

भारत में कोरोना, इस्लामोफोबिया और पश्चिमी मीडिया

सारे कुचक्रों के बावजूद कोरोना हारेगाभारत जीतेगा।

रामचरितमानस का एक वृतांत है। राम और रावण का युद्ध चल रहा है। मेघनाथ, कुंभकरण, अहिरावण सहित  रावण के सभी प्रमुख योद्धा मारे जा चुके हैं। राक्षस सेना काफी कम हो चुकी है। दशानन तकरीबन अकेला है। तुलसीदास जी लिखते हैं कि रावण उस समय सोचता है कि मैं अब अकेला पड़ गया हूँ तो मुझे कुछ कोई और खेल खेलना पड़ेगा:

रावण हृदय बिचारा, भा निसिचर संहार। मैं अकेल कपि भाल बहु माया करों अपार।

यानि हार नज़दीक जानकर रावण, युद्ध में उस समय माया यानि भ्रम की स्थिति पैदा करता है। अपनी सिद्धियों के ज़रिये वह झूठमूठ के अनेक रावण युद्ध के मैदान में पैदा कर देता है। इससे वानर-भालू सेना में दृष्टिभ्रम पैदा हो जाता है। अनेक रावण मैदान में देखकर राम की सेना ही नहीं, आकाश स्थित देवता भी परेशान हो जाते हैं। राम को सबसे पहले इस माया को खत्म करना पड़ता है। और तभी रावण का अंत हो पाता है।

यह पौराणिक गाथा एक सांकेतिक स्थिति का वर्णन करती है। जीवन के तकरीबन हर मोर्चे की यही स्थिति है। युद्ध में भ्रम की स्थिति पैदा करना शत्रु की रणनीति का हिस्सा होता है। इसका उद्देश्य होता है विपक्षियों के मन में संदेह पैदा करके बच निकलने का रास्ता ढूंढ़ना। आज के सन्दर्भ में देखें तो इस समय दुनिया में दो युद्ध चल रहे हैं। एक महायुद्ध है मानवता और कोरोना के बीच का। इस भयानक युद्ध में अब तक दो लाख 52  हजार से ज्यादा इंसान मारे जा चुके हैं। 36 लाख से ज्यादा मनुष्य इससे संक्रमित हो चुके  हैं। ये संक्रमण देश की सीमाएं नहीं जानता और न ही ये मजहब की दीवारों को पहचानता है। मगर इस मौके का फायदा उठाकर कुछ लोग एक और युद्ध में विजय पाना चाहते हैं और वह है भारत में चल रहा नेरेटिव का युद्ध।  नेरेटिव यानि  कथ्य की इस लड़ाई में अब एक भ्रम पैदा करने की कोशिश हो रही है। वह है इस्लामोफोबिया का भूत। 

एक तरफ देश कोरोना  के साथ युद्ध में प्राणप्रण  के साथ लगा हुआ है। वही दूसरी तरफ कुछ लोग, जिसमें मीडिया का एक वर्ग भी शामिल है, इसे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की लड़ाई में परिवर्तित करना चाहता है। ऐसा भ्रम फैलाने के पीछे उसका उद्देश्य है कि कोरोना के साथ जो युद्ध चल रहा है उससे देश का ध्यान भटक जाये। अब तक जो आंशिक सफलता देश ने कोरोना महामारी के विरुद्ध हासिल की है वह तिरोहित हो जाए।

ये विश्व व्यापी महामारी है जो तथाकथित विकसित देशों में अधिक विकराल रूप में फैली है। इससे मरने वाले की तादाद अब (5 मई) तक अमेरिका में 69921, इटली में 29079, फ्रांस में 25201, ब्रिटेन में 28734 और स्पेन में 25428 हो चुकी है। भारत में अभी तक इस बीमारी से अपेक्षाकृत कम नुकसान हुआ  है। इसका श्रेय भारत की आम जनता के त्याग एवं निश्चय, सरकार की तत्परता, प्रधानमंत्री मोदी का लोगों से सीधा संवाद और हमारी गहरी सामाजिक विरासत को जाता है। संभवत यही बात कुछ तत्वों  को पच नहीं रही। खासकर पश्चिमी मीडिया के एक बड़े वर्ग और उनके यहाँ के प्रतिनिधियों को ये शायद असहज लग रहा है। संभवतः उन्हें अपेक्षित था कि यहाँ पश्चिमी देशों से ज़्यादा कहर मचे।  इस वर्ग की नीयत पर संदेह की बात अगर हम छोड़ भी दें, तो ये वर्ग एक खास रंग के  चश्मे से भारत को देखता  आया है। ये भारत को एक अशिक्षित, गरीब, अविकसित, पिछडे, गंदगी से भरे, अस्वस्थ, गैर-अनुशासित और विभाजित मानसिकता वाले देश के रूप देखते आये हैं। शताब्दियों से भारत का चित्रण इसी नज़रिये से होता रहा है। भारतीय समाज की आंतरिक आध्यात्मिक शक्ति, जिजीविषा और उसकी विरासत की मजबूती आज तक ये लोग देख ही नहीं पाए हैं। इसीलिए पश्चिमी मीडिया और उस जैसी सोच रखने वाले अन्य लोग ये समझ नहीं पा रहे कि  इस देश में कोरोना ने अभी तक मौत का तांडव क्यों नहीं मचाया?

इसी नासमझी के कारण शायद #तबलीगीजमात के मामले को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में  एक के बाद एक समाचार आए हैं कि भारत में मुसलमानों को प्रताड़ित किया जा रहा है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि भारत में मुसलमान होना पाप हो गया है। वे इक्का-दुक्का घटना को लेकर यह प्रचारित कर रहे है कि भारत में मजहब के आधार पर इलाज किया जा रहा है। अक्सर लिखने वाले अपने लेखों में ना तो कोई ठोस सबूत देते हैं न ही कोई सटीक उदाहरण ही प्रस्तुत करते हैं। बल्कि कुछ एकाकी घटनाओं को बेतरतीब तरीके से आपस में  जोड़कर यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं की भारत में अब #इस्लामोफोबिया है। इन असंगत घटनाओं का उपयोग वे सिर्फ अपने पूर्व  निर्धारित वैचारिक आग्रहों को सिद्ध करने के लिए ही इस्तेमाल कर रहे हैं।

कुछ  रिपोर्ट्स का उल्लेख करना यहाँ ठीक रहेगा:
"भारत में मुसलमान होना तो अपराध था ही, उसपर ये कोरोना आ गया"  ("It Was Already Dangerous to Be Muslim in India. Then Came the Coronavirus") यह प्रतिष्ठित टाइम मैगज़ीन में 3 अप्रेल को छपे लेख का शीर्षक है। इस शीर्षक को पढ़ने के बाद इसकी निष्पक्षता के बारे में क्या कहा जा सकता है?

13 अप्रेल के 'द गार्डियन' में लिखा गया कि "कोरोना वायरस के पीछे मुसलमानो के षड्यंत्र की कहानियां उन्हें निशाना बनाकर देश भर में फैलाई जा रही हैं"    ("Coronavirus conspiracy theories targeting Muslims spread in India")

पत्रिका 'फॉरेन पॉलिसी' के 22 अप्रेल के अंक की एक रिपोर्ट कहती है - "भारत कोरोना फ़ैलाने के लिए मुसलमानों को बलि का बकरा बना रहा हैं।"  ("India Is Scapegoating Muslims for the Spread of the Coronavirus")

'टेलीग्राफ नेपाल' के 22 अप्रेल के ई-अंक में  "भारत में मुसलमानो का नरसंहार" शीर्षक से एक लेख छपा है । 

'अल जजीरा' की 25 अप्रेल की खबर में तो भारत के पूरे लॉक डाउन को ही इस्लामोफोबिया का प्रतीक बता दिया गया। इस खबर का शीर्षक था "भारत का लॉकडाउन: असमानता और इस्लामोफोबिया की एक गाथा"   ("India's lockdown: Narratives of inequality and Islamophobia")

इस तरह के अनेकानेक समाचार, लेख, सम्पादकीय और टिप्पणियां दुनिया के कई बड़े प्रकाशनों में पिछले कोई एक महीने में लगातार आये हैं। इन्हें गढ़ने वाले कई ऐसे पत्रकार और लेखक हैं जिन्हें ख़बरों की दुनिया में बड़ामाना जाता है। इनमें से अधिसंख्य अपनी ये रिपोर्ट लिखने से पहले ज़मीन पर नहीं उतरे। किंवदंतियों, अर्धसत्योंव्हाट्सएप्प संदेशों (जिनमें कई फेक भी निकले}, पूर्वाग्रह से ग्रसित आलेखों, एकतरफा विचारों और मान्यताओं के आधार पर इन्होने खबरों की आड़ में बस एक नजरिया दुनिया को परोस दिया। निष्पक्षता का तकाज़ा था  कि ये अपने विचारों और अभिमतों को इतना एकतरफा नहीं बनाते।

ये सही है कि मार्च और अप्रेल के महीनों में तबलीगी मरकज के कारण देश में कोरोना के मामलों में वृद्धि हुई। तबलीगी जमात के रहनुमाओं ने अपनी मूर्खताज़िद तथा अंधविश्वास के कारण सबसे पहले तो अपने अनुयायियों की जिंदगी को खतरे में डाला। आगे कई प्रदेशों में कोरोना का संक्रमण उनके कारण गया। इस कारण तब्लीगी जमात लोगों के निशाने पर आ गई। ऐसा अस्वाभविक भी नहीं था। कई लोगों ने तब्लीग़ियों और आम मुसलमानों में भी घालमेल किया। पर पत्रकारीय दायित्व का तकाज़ा था कि ये प्रतिष्ठित प्रकाशन बताते कि तब्लीग़ जमात सारे मुसलमानो का प्रतिनिधित्व नहीं करती। कटटरता और पुरातनपंथ से ग्रसित तब्लीग जमात, इस्लाम का एक पंथ मात्र है। तब्लीग़ियों ने सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, मलेशिया, इंडोनेशिया तथा अन्य कई देशों में भी कोरोना को फैलाने में भूमिका निभाई। ऐसा करने वाले तबलीगी अकेले मजहबी  या पंथिक लोग नहीं थे। अमेरिका में यह काम बाइबल बेल्ट के अंदर रूढ़िवादी चर्च के लोगों ने किया। दक्षिण कोरिया में यह काम चिनशियोजी चर्च के लोगों ने किया। तो फिर तबलीगी मुसलमानों के एक प्रकरण को लेकर पूरे भारत में इस्लामोफोबिया का भूत खड़ा करना कितना सही है?

ऐसा ही नहीं हुआ, बल्कि इस्लामोफोबिया का भूत खड़ा करने के लिए भारत विरोधी निहित स्वार्थी तत्वों ने झूठ और फरेब का एक जाल भी खड़ा किया। खाड़ी के देशों से कई फेक और जाली एकाउंट से सोशल मीडिया पर एक अभियान  चलाया गया। ओमान और सऊदी अरब के राजघरानों से सम्बंधित प्रतिष्ठित लोगों के नाम से भी जाली एकाउंट बनाकर भड़काऊ ट्वीट किये गए। इनमें से कई ट्विटर एकाउंट भारत के चिर विरोधी पाकिस्तान से निकले। भारत में मजहबी फसाद फैलाना तो पाकिस्तान की नीति का अभिन्न हिस्सा है ही।

पत्रकारिता के मानदंड तो कहते हैं कि इस एकतरफा प्रचार की पड़ताल की जाती। पर ऐसा नहीं हुआ।  बिना जांच के मीडिया के इस वर्ग ने इस प्रचार को तथ्य बतलाकर दुनिया को परोस दिया। असल में दिक्कत तब होती है जब आप घटनाओं को देखने के लिए एक खास चश्मा तय कर लेते हैं। फिर आपको सत्य नजर नहीं आता।  इसीलिए कोरोना से संबंधित उद्धृत इन खबरों  में एक खास बनाबट आप देख सकते है। तकरीबन इन सबमें पहले तबलीगी जमात का उल्लेख होता है। फिर लेखक दिल्ली के दंगों को इनसे जोड़ता है। इस तार्किक उछलकूद में मोदी सरकार का जिक्र होना तो स्वाभाविक है ही। जब मोदी का नाम आया तो फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कैसे छूट सकता है? #आरएसएस यानि हिन्दू। और हिन्दू का तात्पर्य सीधे मुस्लिम विरोधी होना। इसे तर्क़ कहें या कुतर्क - पर यही तानाबाना हर घटनाक्रम पर फिट कर दिया जाता है।   घटनाओं के तथ्यपरक, निरपेक्ष और और समग्र विश्लेषण की बजाय वे अपने पूर्वाग्रह को साबित करने के लिए बस घटनाओं का इस्तेमाल करते हैं। वे अपने नजरिए को, जो कि भारत को हिंदू - मुसलमान की दृष्टि से देखता है कोरोना के घटनाक्रम पर भी लागू करना चाहते हैं।

बहुत सुविधा के साथ  वे कई तथ्यों को पूरी तरह अनदेखा करते हैं। #राष्ट्रीयस्वयंसेवकसंघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने 26 अप्रेल के अपने भाषण में कहा कि देश के 130 भारतीय बिना किसी भेद के अपने ही है। एक घटना का इस्तेमाल करके सभी मुसलमानों को दोष देना सही नहीं है। यही बात कमोवेश पिछले अक्टूबर में सार्वजनिक भाषणों में भी उन्होंने कही थी। पर शायद यह बात इन तथाकथित निष्पक्ष पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के कथ्य में फिट नहीं बैठती इसलिए इनकी यह अनदेखी करते हैं।

#कोरोना  के खिलाफ लड़ाई एक लम्बी लड़ाई है। ये तय है कि मानवता के साथ-साथ भारत भी इस लड़ाई को जीत ही लेगा। पर नेरेटिव और कथ्य की लड़ाई में, भारत को एक खास नजरिए से देखने वाले लोग, अपने को ठगा हुआ और परास्त महसूस कर रहे हैं। अपनीं ही सोच के जाल में फंसा हुआ यह वर्ग इसे अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता। दलदल में फँसा हुआ व्यक्ति जिस तरह ज़्यादा हाथ पाँव मारकर अपने को और गहरा डूबा लेता है। ये लोग भी अपने वैचारिक आग्रह में उसी तरह डूबे हुए हैं। जिस तरीके से राम - रावण युद्ध में माया फैलाई गई थी, ये भी संदेह पैदा करके लोगों को दिग्भ्रमित करना चाहते हैं। मगर कोरोना के साथ लड़ाई से हम लोगों का ध्यान हटना नहीं चाहिए।  जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा था 'सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी'   इसलिए सभी भारत प्रेमी लोगों को इस बात का ध्यान रखना है कि  कोरोना के साथ इस लड़ाई को मजहब आधारित भेदभाव में तब्दील ना होने दें। इस लड़ाई में मजहब और पंथों से परे हटकर हर भारतवासी का महत्वपूर्ण योगदान है। ज़रूरी है कि किसी को भी इस आपदा की घडी में दूसरेपन का एहसास ना होने दिया जाए। यह लड़ाई हिंदू - मुसलमान की लड़ाई नहीं बल्कि भारत और भारत विरोधियों की लड़ाई है। और ये निश्चित है कि सारे कुचक्रों के बावजूद कोरोना हारेगा, भारत जीतेगा।

Tuesday, April 14, 2020

कोरोनावायरस का फैलाव : तबलीग और आम मुसलमान


ये एक निर्विवाद तथ्य है कि भारत में कोरोना के जो मामले हैं उनमें से तकरीबन एक तिहाई निजामुद्दीन के तबलीगी मरकज़ के इस्तिमा से जुडे  हैं। यही नहीं, दुनिया के कई अन्य देशों में भी  तबलीगी जमात के लोगों ने कोरोना संक्रमण को आगे फ़ैलाने में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन ये भी सही है कि तबलीग़ जमात ऐसा करने बाला दुनिया का एकमात्र मजहबी संगठन नहीं है। दक्षिण कोरिया में शिन्चियोजी चर्च और इस्राइल में कट्टरवादी यहूदी पंथों ने भी ऐसा ही किया। कुछ और देशों में भी कई पुरातनपंथी मजहबी संगठन जाने अनजाने कोरोना फ़ैलाने में आगे रहे हैं।  मगर हैरानी की बात है कई लोग भारत में इसके बहाने इस्लामोफोबिया का काल्पनिक भूत खड़ा कर रहे हैं।

कोरोना वायरस को लेकर दिल्ली स्थित निज़ामुद्दीन मरकज की हरकतों पर पूरे देश की निगाहें है। देश में कोरोना संक्रमण का आंकड़ा 10000 को पार कर चुका है। देखने की बात है कि पिछले कुछ दिनों में जो नए मामले आये हैं उनमें ज़्यादातर तबलीगी जमात से जुड़े हुए मामले ही है। उदाहरण के लिए सोमवार 13 अप्रेल को दिल्ली में संक्रमण के 356 नए केस मिले। इनमें से 325 तबलीगी जमात से जुड़े पाए गए। इस दिन तक राजधानी में कुल मामलों की संख्या 1510 थी। इनमें से 1071 यानि कोई 71 प्रतिशत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ये बीमारी तबलीगी जमावड़े के कारण लगी। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और हरियाणा आदि राज्यों में भी कोरोना के अधिसंख्य मरीज़ तब्लीगी मरकज़ से जुड़े पाए गए है। ये तथ्य कोई कपोलकल्पना बल्कि सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध आंकड़ों से निकलते हैं।

बार-बार यह कहा जा रहा है कि मरकज का मतलब सभी मुसलमान नहीं है। यह बात सही भी है। पर अहम् सवाल है कि सारे मुसलमानों को तब्लीगी जमात से जोड़ कौन रहा है? इसी सोमवार को जमीयते उलेमाए हिन्द ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आग्रह किया कि मीडिया द्वारा इस तरह से तबलीगी मरकज़ की रिपोर्टिंग पर रोक लगायी जाये। न्यायाधीशों ने ये कहकर इस पर रोक लगाने से इंकार किया कि रोक लगाने का मतलब होगा मीडिया की आज़ादी को खत्म करना। इस मामले में सुनवाई अब आगे होगी। दिलचस्प बात है कि  तबलीगी जमात से फैले संक्रमण की पहचान के लिए पहले कोरोना के ऐसे मामलों के आगे 'टीजे' लिखा जाता था। इससे  ऐसे मामले 'ट्रेस  करने' यानि ढूंढने में आसानी होती थी। मगर राजनीतिक दबाव के कारण कई राज्यों ने कोरोना मरीज़ों की सूची से ये कॉलम ही हटा दिया। दिल्ली के अल्पसंख्यक आयोग के कहने पर दिल्ली की सरकार ने कोरोना वायरस के संक्रमित लोगों की सूची से मरकज का नाम हटाकर उसे स्पेशल ऑपरेशन कहना शुरू किया। तमिलनाडु तथा कई अन्य सरकारों ने तो ये कॉलम हटा ही दिया।

इसमें एक तार्किक विसंगति लगती है। यह तार्किक विसंगति क्या है ? अगर तबलीग सारे मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करती और वो मुसलमानों के अंदर की सिर्फ एक जमात ही है तो फिर उसके कारनामों को छुपाने की आवश्यकता क्या है? तबलीगी जमात  लिखने से सभी मुसलमानों की प्रतिध्वनि क्यों मानी जा रही है? ये सही है कि कोई भी संप्रदाय या पंथ पूरे मजहब के लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। अगर एक कोई संप्रदाय या पंथ कुछ गलती करता है तो उसी तक सीमित रखना चाहिए। इसके बहुत से उदाहरण मौजूद है। 2017 में जब हरियाणा में डेरा सच्चा सौदा के मुखिया की गिरफ्तारी को लेकर हिंसा हुई तो किसी ने उसे पूरे हिन्दू समाज से नहीं जोड़ा। इसी तरह पिछले हफ्ते पटियाला में कुछ सिरफिरे निहंगों ने पुलिस वालों पर हमला लिया तो किसी ने उसे पूरे सिख समाज से नहीं जोड़ा। तो फिर तबलीगी जमात का नाम लेने पर उसे सारे मुसलमानों को निशाना बनाना कैसे और क्यों माना जा रहा हैये तर्क कि मरकज के नाम पर मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है, सही कैसे हो सकता है?

होना तो ये चाहिए कि मुस्लिम समाज का नेतृत्व सामने आकर कहे की तब्लीग़ियों ने जो किया वह गलत था। अल्पसंख्यक समाज के हितो के लिए जरा सी बात पर आवाज़ उठाने वाले राजनीतिक नेताओं, बुद्धिजीवियों और सामाजिक नेताओं को सामने आकर कड़े शब्दों में इसकी निंदा करनी चाहिए थी। इससे ये सवाल ही खड़ा नहीं होता। असल बात तो ये है कि तबलीगी मरकज के जमावड़े ने सबसे ज़्यादा परेशानी अपने अनुयाइयों के लिए ही खड़ीं की हैं। दिल्ली सरकार की रोक के बावजूद मार्च के महीने में हज़ारों लोगों को निजामुद्दीन स्थित अपने मुख्यालय में इकट्ठा करके आपने उनकी ज़िन्दगियों को सबसे ज़्यादा खतरे में डाला है। जो लोग मुसलमानों के हितैषी होने का दावा करते हैं वही तार्किक रूप से तब्लीग़ियों और आम मुसलमानों में फर्क नहीं कर रहे। जबकि आवश्यक है के इन लोगों और आम मुसलमानों में फर्क किया जाए।

इसलिए जब कोई यह कहता है कि मरकज के रहनुमाओं की मूर्खतापूर्ण गतिविधियों के कारण देश के कई हिस्सों में कोरोना बड़ी बुरी तरह से फैल गया तो इसमें गलत क्या  है? सरकारें जब कोरोना वायरस के मामलों में 'टीजे' का कॉलम लिखते हैं तो  वो यह बताने के लिए है कि यह संक्रमण कहां से आया है। संक्रमण का स्रोत जानने से उसके निराकरण की तथा उससे जो लोग प्रभावित हुए हैं उनकी खोजबीन करने में मदद मिलती है। ये लड़ाई अल्पसंख्यक बहुसंख्यक की लड़ाई नहीं है। ये पूरे भारत का कोरोना वायरस से युद्ध है जो दुनिया में एक लाख से ज़्यादा लोगों की मौत का जिम्मेदार है। 

आज दुनिया के अंदर 20 लाख से ज्यादा लोग इससे पीड़ित हैं।  इसलिए उसके स्रोत को छुपाने से या उसके स्रोत को या उसके स्रोत के बारे में भ्रम पैदा करने से इस बीमारी के साथ लड़ाई कमजोर पड़ती है। यहाँ दक्षिण कोरिया का उदाहरण देना भी ठीक होगा। दक्षिण कोरिया में  जो कोरोना के के शुरू के मामले आये उन्हें फैलाया एक ईसाई पंथ चिनशियोजी ने। फ्रांस में भी कुछ ऐसा ही हुआ। वहां की सरकारों ने यह छुपाने की कोशिश नहीं की कि बीमारी के फैलाव का स्रोत कहां है। बल्कि दक्षिण कोरिया ने चिनशियोजी कल्ट के मुखिया ली मैन ही को इसका जिम्मेदार ठहराया। ली मैन ही ने सार्वजनिक रूप से अपने अपराध की क्षमा मांगी। जिस तरीके से  चिनशियोजी दक्षिण कोरिया में सारे ईसाइयों का प्रतिनिधित्व नहीं करता बल्कि एक कल्ट का  प्रतिनिधित्व करता है। उसी तरीके से तबलीगी जमात पूरे मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसलिए ये बताना कि संक्रमण का स्रोत निजामुद्दीन में हुए तबलीगी मरकज से है किसी भी तरीके से मुसलमानों को टारगेट करना नहीं माना जा सकता।

ऐसा करके जो लोग मुसलमानों को और तबलीगी मरकज को मिला रहे हैं। वे भारत के आम मुसलमानों के साथ अन्याय कर रहे है। असल में मुद्दा मुसलमानों का है ही नहीं।    तबलीगी जमात के मलेशिया, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में हुए विभिन्न इस्तिमा से इन देशों भी कोरोना तेज़ी से फैला। वहां पर किसी ने इसे पूरे इस्लाम का का सवाल नहीं बताया। सुन्नी मुसलमानों में तबलीगियों को  में काफी दकियानूसी, पुरातनपंथी और मजहबी कटटरपंथी माना जाता है। इस्लाम की जो व्याख्या तबलीगी करते हैं उससे सभी सुन्नी मुसलमान भी एकमत नहीं है। इनके कट्टरवाद को   लेकर भी अक्सर सवाल उठते रहे है। असल में तो कई देशों में आतंकवादी हिंसा में भी तबलीग़ी पाए गए है। पर ये एक अलग लेख का विषय है। 

दरअसल अपने यहाँ दिक्कत अल्पसंख्यक हितों के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों की है। ये तत्व किसी भी तरीके से अल्पसंख्यकों को अलग करके दिखाना चाहते हैं। वे जानते हैं कि तबलीगी जमात का एक बड़े वर्ग में प्रभाव है। इसलिए तबलीग और मुसलमानों का घालमेल उन्हें राजनीतिक रूप से फायदेमंद दिखाई देता है। ऐसा करके वे अपने वोट बैंक को पक्का करना चाहते हैं। इस समय जबकि पूरा देश एक आपदा की स्थिति में है, ऐसा करके वे जघन्य अपराध कर रहे हैं। ये अपराध पूरे देश के साथ साथ देश के आम मुसलमानों के साथ भी हैं। उन लोगों के साथ ये घोर अन्याय है जिनका  तबलीगी जमात की पुरातनपंथी, दकियानूसी और अवैज्ञानिक सोच से कोई लेना देना नहीं है। मुस्लिम समाज के नेतृत्व को स्पष्टता और दृढ़ता के साथ यह कहना चाहिए तबलीगी जमात मुसलमानों का एक संप्रदाय भर है। तबलीग ने गलती की है और उस गलती के लिए संप्रदाय के रहनुमाओं को सार्वजनिक रूप से क्षमा मांगनी चाहिए। साथ ही सरकारों को तबलीगी जमात के नेतृत्व के साथ कड़ाई से पेश आना चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की हरकतें करके कोई भी नासमझ लोगों को अंधविश्वास की बेड़ियों में डालकर मौत के मुंह में न डाल पाए।

Thursday, March 19, 2020

कोरोना वायरस को हरा सकता है भारत


कल सुबह अखबार में एक अच्छी खबर पढ़ने को मिली। ये खबर आई थी लंदन से। इसमें जो ओसीआई कार्ड होल्डर विदेशों, खासकर इंग्लैंडमें रहते हैं, उन्होंने जिस तरह भारत कोरोना वायरस का सामना कर रहा है उसकी खुली तारीफ की। वैसे इस विषाणु का सही नाम तो कोविद-19 है पर बोलचाल की भाषा में इसे सिर्फ कोरोना कहा जा रहा है। ओआईसी कार्ड उन भारतवंशियों को मिलता है जो विदेशी नागरिक  होने के बावजूद आमतौर से बिना वीज़ा के भारत आजा सकते हैं और काम कर   सकते हैं। वे ब्रिटेन के नागरिक होते हुए भारतीयता के लाभ उठा सकते हैं। अर्थात एक तरह से उनके पास दोहरी नागरिकता है। इस खबर के मुताबिक भारतीयों ने कहा कि ब्रिटेन उस तरीके से कोरोना वायरस के फैलने को रोक नहीं पाया है जिस तरीके से भारत ने किया है।

इनमें से अधिकतर ने भारत आने की इच्छा भी जताई। इन्होने कहा कि कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के जो इंतजाम इंतजाम भारत ने किए हैं वह काबिले तारीफ हैं। उन्होंने ये भी कहा कि वे ब्रिटेन के बजाय कोरोना से भारत में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते है। ऐसी बात कहने वाले कई युवा भी थे। उन्हें इस बात से तकलीफ है कि भारत ने फिलहाल उनकी यात्रा पर पाबन्दी लगा दी है।  

उन्होंने बार-बार कहा कि ब्रिटेन का जो हेल्थ केयर सिस्टम यानि  एनएचएस है  वह अभी तक वायरस को  फैलने से रोकने के प्रभावी कदम उठाने में विफल रहा है। एक के बाद एक कई भारतवंशी ब्रिटिश नागरिकों ने भारत आने की इच्छा जताई ताकि वह भारत की बेहतर और कहीं किफायती स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठा सकें।  सोचने की बात है कि कुछ ही साल में कितना फर्क आ गया है?  कल तक इनमें से अधिकांश भारतवंशी भारत में गंदगी, अव्यवस्था और चिकित्सा सुविधाओं के अभाव का हवाला देते थे। सामान्य समय में भी ये भारत आने से कतराते थे।  आज इस महामारी के कठिन समय में भारत आने की गुहार लगा रहे है। कल तक हमारे देश के लोग इलाज कराने के लिए ब्रिटेन जाते थे और आज ब्रिटेन के लोग कह रहे हैं कि उनका स्वास्थ्य सिस्टम उतना अच्छा नहीं है। 

हैरत की  बात ये है  कि भारत के बारे में यह सराहना उस ब्रिटेन से आ रही है जिसके एक अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने पिछले ही दिनों  भारत पर तंज कसते हुए कहा था कि भगवान का शुक्र है कि यह बीमारी भारत में नहीं पैदा हुई बल्कि चीन से निकली है। नील गोल्डमैन सैच के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री है। उन्होंने एक टीवी कार्यक्रम में  तकरीबन भारत का मज़ाक उड़ाते हुए कहा था कि जिस तरह चीन के प्रशासनिक तंत्र और सरकार ने कठोर कदम उठाते हुए इस महामारी का सामना किया है वैसा भारत तो कर ही नहीं सकता। लेकिन वे शायद ये यह भूल गए कि भारत के लोगों  पर जब संकट आता है तो वह चट्टान की तरह उठ खड़े हो जाते हैं बशर्ते उनको सही दिशा देने वाला हो। वैसे भी ब्रिटेन के कुछ बुद्धिजीवी अभी  इतिहास में ही जी रहे है। नील भी उन्हीं में से एक लगते है। उन्हें चाहिए कि वे अपने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर ध्यान दें तथा भारत को बख्श दें।

वैसे चीन में जब इस अज्ञात शत्रु ने अपना खेल शुरू किया तो कई लोगों के मन में ये सवाल था कि यदि ये भारत में आएगा तो क्या होगा ? सवाल सही भी था क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में हमारा पुराना रिकार्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है। हमारी इतनी बड़ी जनसंख्या को देखते हुए क्या भारत इसको रोक पायेगा यह आशंका सब के मन में थी? लेकिन जिस तरीके से अब तक भारत के आम लोगों, स्वास्थ्य सुविधाएं देने वाली एजेंसियों और सरकारी तंत्र ने इस संकट का सामना किया है वह अद्वितीय है।

सोचिए, ये वही डॉक्टर और स्वास्थ्य अधिकारी हैं दिन रात जिनकी हम आलोचना करते रहे  हैं। वहीं स्वास्थ्य केंद्र,  अस्पताल और हवाई अड्डे हैं जिनके बारे में हम सबके मन में अनेकों सवाल हैं। पर संकट की इस घड़ी में अब तक ये सब जिस तरीके से खड़े हुए हैं वह अद्भुत और  सराहनीय है।

ये सही है कि जिस तरीके से भारत ने अभी तक कोरोना वायरस के संक्रमण  को नियंत्रित किया है वह तारीफ के लायक है। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि इस अनजान शत्रु से युद्ध का यह पहला ही मोर्चा है। अभी भारत कोरोना वायरस संक्रमण के पहले ही दौर में है।  लेकिन इस पहले दौर में भारत के डॉक्टरों , अस्पतालों, स्वास्थ्य सेवा अधिकारियों, कर्मचारियों, वैज्ञानिकों और भारत के राजनीतिक तथा प्रशासनिक नेतृत्व ने अब तक अच्छा काम किया है।  भारत अब कोरोना संक्रमण के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है जो इसका द्वितीय चरण होने वाला है। जिसमें कम्युनिटी  यानि सामुदायिक संक्रमण  का सबसे ज्यादा खतरा  है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरीके से भारत  ने अभी तक इसका सामना किया है आगे भी उसी तत्परताउसी तेजी और उसी सक्रियता के साथ भारत का प्रशासनिक तंत्र, डॉक्टर, अस्पताल, सरकारी और निजी संस्थान तथा  लोग इसका सामना करेंगे।

एक बात तो कहनी ही चाहिए कि भारत के शीर्ष नेतृत्व ने कोरोना वायरस के खतरे को एक चुनौती के रूप में स्वीकार करके उसे एक अवसर में बदला है। उन्होंने सिर्फ भारत के राज्यों और मुख्यमंत्रियों को ही विश्वास में नहीं लिया बल्कि पुराने गिले शिकवे छोड़कर  पड़ोसी देशों को भी साथ मिलाया। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी प्रोटोकॉल या राजनयिक औपचारिकता  की परवाह किए बगैर दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक बुलाई। ये बैठक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई।  जिसमें अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और  बांग्लादेश के शीर्ष नेतृत्व ने हिस्सा लिया। सिर्फ पाकिस्तान से वहां के प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति नहीं बल्कि वहां के स्वास्थ्य मंत्री इस बैठक में रहे। पाकिस्तान ने तो इस संकट की घडी में भी राजनीति की और इस संजीदा मीटिंग में कश्मीर का मामला उठाने की कोशिश की। कुछ भी हो,  जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने दक्षिण एशिया के देशों को इकट्ठा किया वह उनकी तत्परता, कूटनीतिक समझ और और नेतृत्व शैली को दर्शाता है। भारत  ने इस विकट महामारी से लड़ने के लिए दक्षिण एशिया  एक साझा कोष बनाने का भी प्रस्ताव किया। भारत की ओर से इस फंड में एक करोड़ डॉलर के अंशदान की पेशकश भी की गयीं।

दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन यानि सार्क के मंच को इस आपदा के लिए पुनर्जीवित करना एक सही कदम है। क्योंकि संक्रमण और बीमारी देश की सीमाओं के मोहताज नहीं है। दक्षिण एशिया की भौगोलिक - राजनीतिक संरचना ऐसी नहीं है कि कोई एक देश कोरोना से सिर्फ अकेले अपने आप को बचा सके सके।

 30 जनवरी को भारत में कोरोना संक्रमण का पहला मामला सामने आया था तब से अब तक लगभग 7 सप्ताह हो चुके हैं।  इन 7 सप्ताह में कोरोना से संक्रमित मरीज़ो की संख्या 147  है जो कि बाकी देशों में संक्रमण फैलने की औसत से कम है। अगर पड़ोसी देश पाकिस्तान को देखें तो वहां तकरीबन 243 मामले अबतक सामने आ चुके हैं। जहाँ भारत ने इससे लड़ने के लिए तकरीबन पूरी तालाबंदी कर दी है। पर पाकिस्तान अभी तक जैसे कि सो  ही रहा है। उधर चीन से तो ये बीमारी पैदा हुई ही थी। ईरान में भी संक्रमण रुक नहीं रहा। अमेरिका 6524 लोग कोरोना पीड़ित हैं और 116 अमरीकियों की ये महामारी जान ले चुकी है।  यूरोप के देशों की हालत तो और भी खराब है। इटली तो संकटग्रस्त है ही, इंग्लैंड में भी  अबतक 1950 लोग संक्रमित हो चुके हैं और 71 मारे जा चुके हैं।

लेकिन अब हम क्रिटिकल फेज़ यानि संक्रमण के लिए बेहद नाज़ुक दौर में प्रवेश करने जा रहे हैं। लेकिन अब तक देख कर ऐसा लगता है कि भारत में  इंसानियत के इस अनजान दुश्मन को हराने की कूबत है। ये तो मालूम पड़ गया कि भारत के सिस्टम में काम करने का एक नया जज्बा है।  इस संकट ने यह दिखाया है कि पुरानी व्यवस्था को अगर सही दिशा मिल जाए तो भारत वह हासिल कर सकता है जिसके बारे में दुनिया कभी कल्पना भी नहीं कर सकती। भारत ने अबतक  सचमुच में ऐसा ही किया है। हमारे  डॉक्टर, वैज्ञानिक, चिकित्सा कर्मियों के साथ  स्वास्थ्य मंत्री डा हर्षबर्धन, विदेश मंत्री जयशंकर और भारत के प्रधानमंत्री मोदी इस सब के लिए बधाई के पात्र हैं।  आगे आने वाले दिनों में हर हिंदुस्तानी को बेहद सतर्कता और सावधानी बरतने की ज़रुरत है। उम्मीद ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि हम इस बड़े संकट से पार पा ही लेंगे।

Monday, March 2, 2020

दिल्ली को इस्लामाबाद बनाना चाहते हैं शाहीनबागी!





दिल्ली के शाहीन बाग में धरना चलते हुए 2 महीनों से अधिक का वक्त बीत चुका है। इतने वक्त में दिल्ली ने बहुत कुछ सहा है। दिल्ली की हालत और हालात पर कभी फिर बात करेंगे, आज बात शाहीनबागियों की। आखिर शाहीन बाग में सड़क पर  बैठे लोगों की मंशा क्या है? यह चाहते क्या हैं? इस पर थोड़ा विस्तार से गौर करने की आवश्यकता है। दिल्ली ने इस तरह के धरने पहले कभी नही देखे। पर हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों में यह आम बात हो गई है। पाकिस्तान में सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए कट्टर जिहादी तत्व इस तरह के धरने लंबे समय से देते आए हैं।

तहरीक-ए-लब्बैक नाम के संगठन ने 2018 में धरना दे कर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को पंगु बना दिया था। 2017 में भी तहरीक-ए-लब्बैक उर्फ रसूल अल्लाह ने एयरपोर्ट और रावलपिंडी जाने वाले इस्लामाबाद एक्सप्रेस वे और मुर्री रोड को जाम कर दिया था। दोनों ही धरनों के बाद तत्कालीन पाक सरकारों ने उनकी बातें मानी थी। एक बार तो एक केंद्रीय मंत्री तक को हटा दिया गया था। इन प्रदर्शनकारियों के सिर पर पाकिस्तानी फौज का हाथ बताया जाता है। जो पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार से हिसाब चुकता करने के लिए इस तरह के कट्टर जिहादी संगठनों को खुले आम बढ़ावा देती है। यहां तक कि पाक फौज के आला अफसर तहरीक-ए-लब्बैक के लोगों को पैसे बांटते हुए तक पाए गए गए थे । तहरीके लब्बैक के खादिम हुसैन रिज़वी के तरीकों को कुछ लोग अब हिंदुस्तान में आज़मा रहे हैं। ये भी भारत की चुनी हुई सरकार को ना मानने पर अड़े हैं। 

आप कहेंगे कि इस्लामाबाद और दिल्ली के धरनों में क्या समानता है। दोनों में खास बात यह है कि बुनियादी तौर पर दोनों धरने वहां कि विधि सम्मत स्थापित सरकारों के खिलाफ हो रहे थे। पाकिस्तान में तो धरने नवाजशरीफ सरकार के खिलाफ हुए थे पर दिल्ली में धरना भारत की संसद द्वारा लंबी बहस के बाद बहुमत से पारित एक कानून को बदलवाने के लिए हो रहा है। दिल्ली और इस्लामाबाद के धरने जोर जबर्दस्ती से अपनी बात मनवाने की रणनीति है। यह सीधे सीधे ब्लैकमेलिंग है। 'हम जो चाहते हैं वैसा करो' और 'अगर वैसा नहीं होगा' तो हम आम जनजीवन को ठप्प कर देंगे। ज़ोर ज़बरदस्ती से सरकार को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देंगे। यानी कानून द्वारा स्थापित व्यवस्था को नहीं मानेंगे, जरूरत पड़ी तो हिंसा पर भी उतारु होंगे।

शाहीन बाग के धरने का सीधा संबंध दिल्ली के अंदर पिछले हफ्ते हुई व्यापक हिंसा से है। उत्तर पूर्वी दिल्ली में शाहीन बाग की तर्ज पर कुछ लोग धरने पर बैठना चाहते थे। उन्होंने महिलाओं को आगे किया।  जब उन्हें उठाने की, खदेड़ने की कोशिश की गई तो उन्होंने हिंसा का सहारा लिया। शाहीन बाग के धरने और उत्तर पूर्वा दिल्ली के दंगों के पीछे की बुनियादी सोच एक ही है, कि अगर हमारी बात नहीं मानी जाएगी तो हम किसी भी हद तक जाएंगे। चाहे वह  धरने की मार्फत आम जनजीवन ठप्प करना हो या हिंसा का सहारा लेना। मकसद एक ही है ब्लैकमेलिंग। दोनों में सोच के तौर पर कोई फ़र्क़ नहीं। अन्तर सिर्फ विरोध के तरीके का ही है।



पाकिस्तान में तो साफ है कि चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने का काम वहां की फौज किया करती है। पर हिंदुस्तान में इस धरना ब्लैकमेलिंग के पीछे कौन सी ताकतें काम कर रही हैं? हाशिए पर जा चुके अल्ट्रा लेफ्ट और कट्टर जिहादी इस्लामिस्ट, आपको साफ तौर पर इस धरना ब्लैकमेलिंग के पीछे नजर आ जाएंगे। हिंदुस्तान में दोनों ही अपने को साबित करने के लिए झटपटा रहें हैं। और जाने अनजाने इनका साथ दे रही है अपनी पहचान के लिए जूझ रही कांग्रेस। दुनिया भर में लेफ्ट के पांव पूरी तरह से उखड़ चुके हैं। उनके विचार के समर्थक अब कम ही बचे हैं। सीएए  के मुद्दे पर उन्हें लगा कि मुसलमान ही एक ऐसी कौम है जिसे आसानी से उकसाया जा सकता है। इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ मिलकर इस लेफ्ट ने एक नई रणनीति बनाई। ये रणनीति है  धरना ब्लैकमेंलिग की।



अब भारत कोई पाकिस्तान तो है नही कि यहां इस्लामी कट्टरपंथ के लिए समर्थन मिल जाए। इसलिए धरना-ब्लैकमेलिंग के लिए इन कट्टरपंथियों ने हथियार के तौर पर चुना है सविंधान को। क्योंकि इस ब्लैकमेलिंग को सर्व साधारण का समर्थन तभी हासिल हो सकता था जब यह सविंधान के दायरे में नजर आए। ब्लैकमेलिंग को तिरंगे के आवरण में लपेट कर जनता के सामने पेश किया गया। सविंधान और तिरंगे में भारतीयों की आस्था की वजह से देशवासियों को आसानी से बरगलाया जा सकता है। सविंधान और तिरंगा इन इस्लामिस्ट और लेफ्ट अतिवादियों के लिए अपने आखिरी मकसद को पूरा करने का औज़ार मात्र हैं। इनके लिए संविधान और  तिरंगा आस्था का विषय कभी नहीं रहा। इनका तो मकसद ही संविधान को उखाड़ फेंकना है।  इनका अंतिम मकसद एक ही है भारत के टुकड़े करना।



"जिन्ना वाली आज़ादी' के नारे भी शाहीन बाग के मंच से कई बार उछले। 'तेरा मेरा रिश्ता क्या, ला इलाहा इलल्लाह', या 'पाकिस्तान का मतलब क्या , ला इलाहा इलल्लाहइन नारों को भारत में लगाने का मतलब क्या हैये नारे तो भारत के विभाजन के नारे है। दरअसल शांतिपूर्ण ब्लैकमेलिंग के लबादे में धरने के वक्त ही कई सुराख नजर आने लगे थे। लेफ्ट के नुमाइंदे और शाहीन बाग के धरने के आयोजकों में से एक सरजिल इमाम ने तैश में आ कर नॉर्थ ईस्ट को भारत से काट फेंकने की अपनी पूरी प्लानिंग ही खोल दी। वहीं मुल्लाओं की पार्टी मजलिस-ए-एत्तेहादुल-मुसलमीन के नेता वारिस पठान ने 100 करोड़ हिंदुओं को देख लेने की खुली धमकी दे डाली। किसी ने हिंदुओं के खुले आर्थिक बहिष्कार की घोषणा की तो किसी ने चुन चुन कर हिंदुओं के खात्में की बात कही।  कपटपूर्ण शांतिपूर्ण ब्लेकमेलिंग के चोर दरवाजे से निकली इन चिंगारियों ने ही  दरअसल दिल्ली को सुलगा दिया। शाहीन बाग के बाद जाफराबाद, मस्तफाबाद, चांद बाग और ना जाने कहां कहां दिल्ली में यही प्रयोग दोहराए जाने लगे।



जब ये ब्लेकमेलिंग कारगर नहीं हुई तो, उपद्रवियों ने दिल्ली को आग के हवाले कर दिया। शांतिपूर्ण ब्लैकमेलर्स के तौर तरीके बिलकुल साफ है।  महिलाओं की आड़ लो, सविंधान की दुहाई दो, तिरंगा लहराओं, अंबेडकर और गांधी के आगे दीपक जलाओ, हर वो काम करो जो ऐसा लगे कि सविंधान के दायरे में हो रहा है। पर वो जानते हैं कि वो कर क्या रहे हैं। वो कई लाख लोगों की जिंदगी नरक बना रहे हैं। वो देश को राजनीतिक अस्थिरता का शिकार बना रहे हैं उसे आर्थिक रूप से कमजोर कर रहे हैं। यानी बात मानी तो ठीक, नही तो पूरे देश को यह ब्लैकमेलर्स बंधक बना लेंगे आग के हवाले कर देंगे। इन लोगों ने देश की अदालतों के दावपेंचों का भी खूब इस्तेमाल इस दौरान किया। देश का सुप्रीम कोर्ट तक इनके झांसे में आ गया।



सवाल उठता है कि अल्ट्रा लेफ्ट एक ऐसी विचारधारा है जिसका वजूद मिटने को है। तो फिर यह इतनी मजबूत कैसे हो गई कि इसने पूरे देश को ही बंधक बना लिया। दरअसल नागरिकता कानून पर अफवाह फैला कर इन्होने आम मुसलमानों को बरगलाया और जिहादी इस्लामिस्ट से गठजोड़ बना लिया। मोदी विरोधी मीडिया का एक बड़ा वर्ग और विपक्षी इनके साथ हो गए। सीएए  पर एक फरेबी नेरेटिव तैयार किया गया जिसमें लोग बहक गए। आम भारतीय मुसलमान को समझना होगा कि अल्ट्रा लेफ्ट और कट्टर मुल्लाओं का आपस में याराना है। ये दोनों ही उसके हितैषी नहीं है। कट्टर मुल्ला उसे गजवा-ए-हिंद का सपना दिखाते हैं और अल्ट्रा लेफ्ट उस भारतविरोधी सपने को सविंधान का मुल्लमा पहनाते हैं। वो इस ब्लैकमेलिंग को इंटेलेक्चुअल सपोर्ट प्रदान करते हैं। मुसलमानों को समझना होगा कि यह देश उनका है।  वो पहले भी भारतीय है और बाद में भी। उन्हें अपनी चुप्पी तोड़नी होगी। अल्ट्रा लेफ्ट और इस्लामी कट्टरपंथियों को उनकी औकात बतानी होगी। उन्हें बताना होगा कि वे कोई जर खरीद गुलाम नही हैं। सबसे पहले मुसलमानों को अपने को इन ब्लैकमेलर्स के चंगुल से छुड़ाना होगा। अगर मुसलमान इन की गिरफ्त से बाहर आ गया तो देश अपने आप बाहर आ जाएगा।  


उधर सरकार को भी ध्यान रखना होगा कि वह उस तरह से सोती न रह जाये जैसा कि दिल्ली के दंगों के समय हुआ। यह कोई आम कानून व्यवस्था का सवाल नहीं बल्कि एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है। उसे ज़रूरी समझदारी, बल और कड़ाई से इन लोगों से निपटना चाहिए। भारत में कानून का राज्य है। संविधान नागरिकों को विरोध करने का अधिकार तो देता है। पर यह अधिकार असीमित नहीं है। कोई कहीं भी झंडा और डंडा गाड़कर विरोध नहीं कर सकता। ये  विरोध संसद और विधान सभाओं में हो सकता है , अदालतों में हो सकता है। पर सड़कों और सार्वजनिक स्थानों  पर ऐसी अराजकता संविधान और कानून सम्मत नहीं है। शाहीन बागियों और दंगाइयों को दिल्ली को इस्लामाबाद बनाने की इस साज़िश में कामयाब नहीं होने दिया जा सकता।

Sunday, February 2, 2020

नींव की नई ईंटें लगाता भारत

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जब नीव की ईट लगाई जा रही होती है तो उस पर बहुत लोग ध्यान नहीं देते। पर असली बात तो यह है कि जिस नीव की ईट को जमीन के अंदर दफन कर दिया जाता है उसी की मजबूती पर ही कोई भवन टिका रह सकता है। जो कंगूरे हमें भवन की प्राचीर पर दिखाई देते हैं उनकी सुंदरता, उनकी रमणीयता और उनका टिकाऊपन निर्भर करता है कि नीव की ईट कितनी मजबूत और कितनी गहरी है। ये बात सिर्फ एक इमारत पर ही नहीं बल्कि एक राष्ट्र पर भी लागू होती है। कोई देश कितना कितना मजबूत होगा और वह कितना आगे जायेगा यह निर्भर करता है कि उसकी बुनियाद के सिद्धान्त और निर्णय कितने ठोस और साहसपूर्ण हैं।

इस देश की आजादी के 70 साल बाद आज कुछ बुनियादी और आमूल परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों की गंभीरता और उनका दूरगामी प्रभाव शायद आज हमें उसी तरह से दिखाई नहीं दे जैसे कि नींव की ईंटें होती हैं। लेकिन भारत की दुनिया में जो हैसियत है और जो आगे भी छवि देश की बनेगी उसके लिए ये परिवर्तन बेहद दूरगामी हैं। असल में देखा जाए तो एक बिल्कुल नया भारत उभरता हुआ दिखाई देता है। पिछले कोई 5 -6  बरस के सरकार के फैसलों और अंतर्राष्ट्रीय कदमों को हम लें तो उनमें एक निरंतरता और नई सोच नज़र आती है। इन क़दमों ने भारत की विदेश और रक्षा नीति की यथास्थितपरक जड़ता को तोड़ा है। इस कारण कई बार इसकी प्रतिक्रिया में कुछ उद्वेलन सा भी दिखाई देता है जो स्वाभाविक ही है। नागरिकता कानून में संशोधन के बाद अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और अंदरूनी शोर को इसी नज़रिये से देखा जा सकता है। 

पहले भारत को माना जाता था एक सॉफ्ट देश है। ऐसा देश जिसके खिलाफ कुछ भी कहा जा सकता था और  कुछ भी किया जा सकता था। पहले यह देश कुछ बयान देकर चुप हो जाता था। उन बयानों को भी दुनिया सुना अनसुना कर देती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है।  एक के बाद एक उदाहरण आप देखें तो आपको नज़र आएगा कि देश अपने आप को नए तरीके से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है। मानो, ये दुनिया को कह रहा है कि भारत को हल्के में मत लेना। बात सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक या बालाकोट के हमलों की ही नहीं है । जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35 ए को निष्प्रभावी बनाने से लेकर नागरिकता कानून में संशोधन और रूस से एस 400 मिसाइल सिस्टम को खरीदने तक के कदम बताते हैं कि भारत अपनी एक नई इबारत लिख रहा है। 

यहाँ नागरिकता कानून को लेकर मौजूदा उदाहरण को देना आवश्यक होगा। अचानक से यूरोपीय यूनियन की संसद में भारत के नागरिकता कानून पर एक प्रस्ताव आया। ये प्रस्ताव पाकिस्तान समर्थक वामपंथी विचारधारा वाले यूरोपीय सांसदों ने यूरोप की संसद में रखा। इस प्रस्ताव में भारत के नागरिकता कानून के बारे में सचमुच अनर्गल प्रलाप  किया गया था। इस प्रस्ताव पर बहस के बाद मतदान का प्रावधान था। पहले का भारत होता तो इस पर शायद विदेश मंत्रालय कुछ बयान देकर रह जाता।  इस बार ऐसा नहीं हुआ। सबसे पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने यूरोपीय संसद के अध्यक्ष डेविड सिसौली को ने एक पत्र लिखा। उन्होंने इस पत्र में  कहा कि आप इस पर बहस करके मतदान करेंगे तो फिर समझ लीजिए एक नई और खतरनाक परिपाटी की शुरुआत होगी। इसका अर्थ हुआ कि कोई भी देश दूसरे देश की संसद के प्रस्तावों पर बहस कर सकता है। श्री बिड़ला ने लिखा कि यह लोकतंत्र के सिद्धांतों और मर्यादाओं का उल्लंघन होगा।  लोकसभाध्यक्ष को इस न्यायोचित, तर्कसंगत, लोकतान्त्रिक समझदारी से परिपूर्ण इस पत्र के लिए धन्यवाद दिया जाना चाहिए। लेकिन भारत इस पत्र पर ही नहीं रुका। देश के राजनयिकों ने यूरोपीय संसद के मुख्यालय ब्रुसेल्स में कूटनीतिक दबाव बनाया और यूरोप की संसद को यह बात समझ में आई कि इस पर मतदान करना उचित नहीं होगा। इस उलजलूल प्रस्ताव पर मतदान टाला गया। 

इसी तरह मलेशिया का मामला भी लिया जा सकता है जहाँ भारत ने अपने हितों की रक्षा के लिए अपने बाज़ार की ताकत का कुशलता के साथ उपयोग किया। मलेशिया के 94 वर्षीय प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद आजकल पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं। मलेशिया, तुर्की और पाकिस्तान मिलकर एक नया इस्लामिक गुट बनाना चाहते हैं। इसके लिए जम्मू कश्मीर और नागरिकता संशोधन कानून पर  महातिर मोहम्मद ने भारत को निशाना बनाया। पहले वाला भारत शायद  इस मामले में बयानबाज़ी तक सीमित रहता।  इस बार भारत ने दिखाया कि वह अपने खिलाफ किए जाने वाले किसी भी दुष्प्रचार दूर करने के लिए किसी भी हद तक जाएगा। मलेशिया से बड़ी मात्रा में पाम आयल हमारे देश में आता है। भारत ने अनौपचारिक तौर से मलेशिया से आने वाले पाम ऑयल के आयात पर कटौती कर दी इससे मलेशिया की गहरी आर्थिक हानि हुई। पाम आयल का बाज़ार टूट गया। परिणाम हुआ कि मलेशिया घुटनों पर आ गया। जो महातिर मोहम्मद कल तक बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे अब कहने लगे हैं कि हम भारत जैसे बड़े देश से पंगा नहीं ले सकते। इसी तरह हमें याद रखना चाहिए कि जब डोकलाम में चीन ने हमारे धैर्य की परीक्षा लेने की कोशिश की तो हमने आंख में आंख मिलाकर  चीन को बताया कि इस तरह की दादागिरी नहीं चलेगी।

और तो और व्यापार के मामले में हमने अमेरिका से भी साफ-साफ बात की। रूस से हथियार मंगाने के मुद्दे पर अमेरिका ने हमें चेतावनी दी हमें कहा कि अगर हम रूस से मिसाइल सिस्टम मनाएंगे तो हमें नुकसान होगा। अमेरिका से दोस्ती भारत लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इस मामले पर उसे भारत ने बता दिया कि हमारे राष्ट्रीय हित में जो फैसला होगा हम करेंगे। इस पर हम किसी की नहीं सुनेंगे।  अमेरिका को इस पर पीछे हटना पड़ा।   

इसके अलावा भी बहुत से कदम ऐसे हैं लगता है कि यह भारत एक नया भारत है जिसकी बुनियाद में आत्मविश्वास है, अपनी शक्ति के प्रति जिम्मेदारी है, अपने स्वाभिमान का आभास है और दुनिया में अपनी भूमिका क्या होने वाली है इसकी सजग अनुभूति है। लेकिन देश किसी मुगालते में नहीं रह सकता।  भारत के इन नये क़दमों का विरोध होगा। हो भी रहा है। परन्तु इस विरोध के भय से देश उन क़दमों को पीछे नहीं खींच सकता जो भविष्य के नए भारत की भव्य इमारत की आधारशिला हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तिया यहाँ खूब सटीक बैठती हैं:
स्वातंत्र्य गर्व उनका, जिनपर संकट की घात न चलती है,
तूफानों में जिनकी मशाल कुछ और तेज़ हो जलती है ।
लक्षमण-रेखा के दास तटों तक ही जाकर फिर जाते हैं,
वर्जित समुद्र में नाव लिए स्वाधीन वीर ही जाते हैं ।