Friday, June 3, 2016

आम की मंडी से डिजिटल इंडिया ! #DigitalIndia




आप सोच रहे होंगे कि भला आम की मंडी का डिजिटल दुनिया से क्या वास्ता? डिजिटल नाम सुनते ही फिलहाल हमारे ज़हन में एक जो तस्वीर उभरती है वो है चकाचौंध वाले बंगलुरु और गुडगाँव जैसे शहर, बड़ी बड़ी एयर कंडीशंड इमारते, अंग्रेज़ी में गिटपिट करते लोग और नामीगिरामी विदेशी कंपनियों में काम करते अंग्रेजीदां लोग.  मगर साहब, नवी मुंबई में वाशी की फलों की मंडी में एक नयी दुनिया से रूबरू होने का मौक़ा मिला. पता चला कि दूरसंचार टेक्नोलोजी में जो परिवर्तन हो रहे हैं उसका आम हिन्दुस्तानी के लिए मायने क्या है? डिजिटल इंडिया रोज़ मेहनत मशक्कत करने वालों के लिए भी मतलब की चीज कैसे है?  #4जी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है कहाँ है? ये तस्वीर डिजिटल इंडिया की हमारे मन में पहले से बनी हुई तस्वीर से बिलकुल अलग है.



मैंने जो डिजिटल तस्वीर देखी उसमें दिहाड़ी के मजदूर, छोटे कस्बों/शहरों से आने वाले देहाती लोग और देशी भाषा बोलने वाले आम हिन्दुस्तानी है. आपको अचरज होगा कि मैं क्या बात कर रहा हू? पहली बार मुझे भी बड़ी हैरानी हुई थी. मैं गया तो आम खरीदने था मगर उसके साथ लेकर आया आम की मंडी से डिजिटल इंडिया को लेकर एक बिलकुल अलग नजरिया. इन तस्वीरों में मेरे साथ सेल्फ़ी में एक हैं बहराइच के बरकत मलिक और इलाहाबाद के अल फ़रीद. उन्हीके साथी थे राजेन्द्र जिन्होंने आमों को पेटी में भरने में मदद की. राजेंद भी बहराइच से ही हैं. ये देखकर काफी हैरानी हुई कि ज़्यादातर मज़दूर टीक दोपहरी में सुस्ताने की बजाय अपने स्मार्ट फ़ोन पर गाना सुनते, फ़ेसबुक पर खेलते, बातचीत करते या कुछ डाउनलोड करते नज़र आए.



सबसे हैरानी तो ये हुई कि बातों के दौरान बिना बताये ही, बरकत अपने फोन के ज़रिये मेरे फ़ेसबुक पेज पर पहुँच गया और जान गया कि में कोई पत्रकारनुमा जीव हूँ. फट से बोला कि वो तो बसपा का समर्थक है और बहन जी इस बार यूपी में सपा और भाजपा को कड़ी टक्कर देंगीं. मगर आम की पेटी बांध रहे राजेन्द्र ने उसे टोका कि बीजेपी भी मैदान में है और वो खुद बीजेपी वाला है, लेकिन उसे अफ़सोस था कि उसके इलाक़े से कोई मज़बूत आदमी कमल छाप से लड़ने वाला नहीं है. दिलचस्प बात है कि ये दोनों ही कामकाज नवी मुंबई में करते हैं मगर चुनाव के वक़्त यूपी ज़रूर जाते हैं. बरकत ने मुझसे अससुद्दीन ओवैसी Asaduddin Owaisi की विडीओ लिंक शेयर करने को कहा। मैंने अपने #Jio कनेक्शन से उसे ओवैसी और Dr. Subramanian Swamy की बहस दिखाई भी। महत्वपूर्ण है कि अल फरीद और बरकत दोनों ने जानना चाहा कि मैं ओवैसी के बारे में क्या सोचता हूँ?


अपने अल फ़रीद की परेशानियाँ कुछ और ही थीं. उसे पहली चिंता तो ये थी कि फलों की मंडी में आम वग़ैरह के साथ उसकी कोई फ़ोटो सोशल मीडिया पर ना चली जाए. दरअसल 18/19 साल के फ़रीद को हमउम्रों के बीच अपनी इमेज की बेहद चिंता थी क्योंकि वो सिर्फ़ छुट्टियों में इलाहाबाद से मुंबई आया है और इसी दरमियान थोड़े वक़्त के लिए अपने मामू की दुकान पर बैठा था. मगर उसने बहुत जोर देकर कहा कि उसके साथ सेल्फ़ी ज़रूर ली जाए. उसने दूसरा आग्रह किया कि अगर मेरे पास क्रिकेटर रोहित शर्मा से जुड़ी कोई तस्वीर/विडीओ हो तो मैं उसे ज़रूर भेज दूँ. वह Rohit Sharma का ज़बरदस्त फ़ैन है.




मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि ये सब लोग मोबाइल टेक्नोलोजी के उपयोग में एकदम सहज थे. वे बड़े आराम से वाईफाई का इस्तेमाल कर रहे थे हाँ इंटरनेट की स्पीड को लेकर सबको शिकायत और परेशानी ज़रूर थी. तक़रीबन सबने तुरंत मुझे whatsapp करके फलों के राजा आम की कई तस्वीरें भी भेजीं. ये तसवीरें मैंने अपने फेसबुक पेज https://www.facebook.com/uu.umeshupadhyay/ पर शेयर कीं हैं. इनमें से ज्यादाटार छोटे दुकानदार, आढ़ती और कई दिहाड़ी के मजदूर थे. इन सब लोगों से मिलकर मालूम पड़ा कि आख़िरकार टेक्नोलोजी है किसके लिए ? और जब भी इन्हें अच्छी नेट स्पीड कम दामों में मिलने लगेगी हिन्दुस्तान् की सिर्फ टेलिकोम मार्किट का नहीं बल्कि देश का समूचा नक्शा ही बदल जाएगा.

अगर देखा जाए तो #DigitalIndia की ज़रुरत बड़े शहरों और लोगों से ज्यादा अल फरीद, बरक़त और राजेंद्र जैसे भारतीयों को है. देश के दूरदराज़ शहरों, कस्बों और गांवों में संचार की इस सुविधा का इस्तेमाल ये लोग अपने अपने तरीके से करेंगे. किसीका धंधा बढेगा, कोई पढ़ाई में इसका इस्तेमाल करेगा, कोई इससे अपना संपर्क बढ़ाएगा, किसी को अपने कामकाज में नयी जानकारी मिलेगी तो कोई सिर्फ मनोरंजन के लिए इसका इस्तेमाल करेगा. मगर ये सही है कि करोंडो हिन्दुस्तानियों के दिल और दिमाग को ये तेज़ गति से मिलने वाली 4जी टेक्नोलोजी एक दूसरे के और करीब लायेगी. यानि करोंडो हिन्दुस्तानियों की कल्पनाशीलता और बुद्धि जब एक दूसरे के साथ जुड़कर काम करेगी तो फिर देश कहाँ पहुँच सकता है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है!

जो भी हो वाशी की मंडी मैं लेने तो गया था अल्फान्सो मगर आम के साथ साथ मिले मुझे गुठलियों के ‘डिजिटल’ आम !!  

#DigitalIndia
उमेश उपाध्याय
2 जून 2016


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