Sunday, April 27, 2014

#Sonia #rahulgandhi भारतीयता की ठेकेदारी !



भारतीयता की ठेकेदारी !
“अचानक से सेकुलरवाद को खतरा बढ़ गया है।“ जब जब कॉंग्रेस की कुर्सी खतरे में नज़र आती है तो सेकुलरवाद को बचाने की गुहार लगनी शुरू हो जाती है। सोमवार को तमिलनाडु में एक जनसभा में राहुल गांधी ने कहा कि “दिल्ली में ऐसी सरकार नहीं आनी चाहिए जो हिन्दू को  मुसलमान से लड़ाये।“ कॉंग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी तो इससे भी आगे गयी और उन्होने तकरीबन तीन मिनट के अपने “राष्ट्र के नाम संदेशनुमा विज्ञापन में इस चुनाव को देश तोड़ने वालों और देश जोड़ने वालों के बीच की लड़ाई करार दिया। उन्होने “भारतीयता और हिंदुस्तानियत” को बचाने की अपील की। 

मुझे इस पर आपत्ति नहीं है कि वे इन दोनों शब्दों को ठीक से बोल भी नहीं पायीं। हांलांकि पिछले तकरीबन 10 साल से देश की “वास्तविक प्रधानमंत्री” और सत्ता की कुंजी हाथ में रखने वाली होने के नाते ये देश ये अपेक्षा तो उनसे कर ही सकता है कि वे इसके नाम को ठीक तरीके से बोलें ! उनकी उच्चारण संबंधी अशुद्धियों को तो अनदेखा किया जा सकता है परंतु भारतीयता की ठेकेदारी” के उनके दावे को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। पिछले दस साल में यूपीए खासकर कॉंग्रेस ने ऐसा क्या किया कि सिर्फ उसीको इस देश का रक्षक मान लिया जाये ? और नरेंद्र मोदी ने इस दौरान ऐसा क्या किया जिस कारण उनपर ये तोहमत लगाई जाये?

अब तक की सारी खबरों और संकेतों के मुताबिक कॉंग्रेस अबतक के सबसे खराब चुनावी प्रदर्शन की और बढ़ रही है। देश का तकरीबन हर तबका उससे नाराज़ नज़र आ रहा है। बेहतर होता कि सोनिया गांधी इन संकेतों का गंभीर विश्लेषण करतीं न कि विपक्ष पर ऐसा आरोप लगातीं जो उनके पद और गरिमा के अनुरूप नहीं है। देश का जन मानस यूपीए से सिर्फ इसलिए नाराज़ नहीं है कि देश का राज काज उसने चौपट कर दिया, अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया और भ्रष्टाचार की सारी सीमाओं को लांघ दिया। 

देश इसलिए भी नाराज़ है कि  यूपीए ने लगातार समाज को बांटने की कोशिश  की, देश की सुरक्षा के साथ समझौता किया और राष्ट्र के दूरगामी हितों की चिंता नहीं की। याद कीजिये प्रधानमंत्री के उस बयान को कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यकों का है। क्या ये समाज में द्वेष बढ़ाने वाला बयान नहीं है ? सच्चर कमीशन और रंगनाथ आयोग का गठन क्या पूरे देश मैं विश्वाश पैदा करने वाला कदम था? आतंकी घटनाओं के बाद सुरक्षा बलों पर भरोसा न करके उल्टे सीधे बयान देने वाले अपने शीर्ष नेताओं पर लगाम न कसके उन्होने समाज को लगातार क्या संदेश दिया?

मुंबई में आतंकी हमलों के बाद हेमंत करकरे के बारे में दिग्विजय सिंह के बयान और दिल्ली में बटला हाउस एंकाउंटर को जिस तरह से कई बड़े नेताओं ने सारे मामले को हिन्दू मुसलमान का मुद्दा बनाने की कोशिश  की क्या वह ज़िम्मेदारी का काम था? और तो और इस सरकार ने तो भारतीय सेना को भी सांप्रदायिक आधार पर बांटने की कोशिश की। आज सुरक्षा के मामले में जो देश के हालात है वो किससे छुपे हुए है ? नौसेना में एक के बाद एक हादसे हो रहे हैं। थल सेना में जितने विवाद पिछले दिनों में हुए उतने तो पहले कभी नहीं हुए।
आंतरिक सुरक्षा के मामले मैं माओवादी हिंसा पर तो स्वयं सोनिया गांधी सरकार को पीछे धकेलती रहीं हैं। जब तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने माओवादी हिंसा के खिलाफ कड़े कदम उठाने की कोशिश की थी तो सोनिया ने खुद कॉंग्रेस जन के नाम खुला पत्र लिखकर माओवादियों की हिमायत की थी। तो फिर सोनिया गांधी किस हक़ से कह रहीं हैं कि अगर वे सत्ता से हट गईं तो भारतीयता खतरे में पड़ जाएगी?
 
आज देश के कुल कितने राज्यों में कॉंग्रेस की सरकार है - महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल, असम, अरुणाचल, केरल और उत्तराखंड बस। तो क्या कहना चाहती है कॉंग्रेस क्या बाकी देश में भारत और भारतीयता खतरे में है? क्या ये माना जाये कि सोनिया गांधी की कॉंग्रेस भाजपा और उनके नेताओं की देश के प्रति प्रतिबद्धता को ईमानदार नहीं मानतीं? सोचिए तो कितना गंभीर आरोप है ये? होना तो ये चाहिए था कि भाजपा उनके इस बयान के खिलाफ उन्हे चुनाव आयोग मे ले जाती और माफी मांगने को कहती। मगर शायद मामले को बढ़ाकर भाजपा सोनिया को कोई भाव नहीं देना चाहती। कॉंग्रेस को चाहिए कि वो अपने गिरेबान में झाँके न कि दूसरों को भारतीयता और उनकी प्रतिबद्धता पर उपदेश दे। 
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उमेश उपाध्याय
23 अप्रेल 2014  

Wednesday, October 9, 2013

#Electoral Reforms चुनाव सुधार : उच्चतम न्यायालय का एतिहासिक फैसला

भारत में अब गलत छवि वाले उम्मीदवारों को रद्द करने का अधिकार यानि “राइट टू रिजेक्ट” लोंगों को मिल गया है. उच्चतम न्यायालय और चुनाव आयोग दोनों ही बधाई के पात्र हैं. न्यायालय इस फैसले के लिए और  जिस रफ़्तार के साथ फैसले को लागू किया गया है उसके लिए चुनाव आयोग की जितनी भी सराहना की जाए वो कम है.

  
मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और मिजोरम के अगले महीने होने वाले चुनावों में मतदाताओं को ये अधिकार भी होगा वे हर प्रत्याशी को “रद्द कर” सकें. ईवीएम मशीन में “इनमें से कोई भी नहीं” यानि “नोटा” का विकल्प भी चुनाव आयोग इस बार देने जा रहा है. ये एक बड़ा चुनाव सुधार है जो उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद आया है. इसके तहत भारत में अब गलत छवि वाले उम्मीदवारों को रद्द करने का अधिकार यानि “राइट टू रिजेक्ट” लोंगों को मिल गया है.

यह अधिकार हांलाकि अभी अधूरा ही है. ऐसा नहीं होगा कि अगर किसी क्षेत्र के अधिकांश मतदाताओं ने “रद्द करने” का विकल्प चुना तो भी फिलहाल चुनाव रद्द नहीं होगा और बचे हुए मतों में से जिस प्रत्याशी को ज्यादा वोट मिलेंगे वो जीता हुआ घोषित कर दिया जाएगा. उदहारण के लिए अगर किसी क्षेत्र में 90 प्रतिशत मतदाता अगर “इनमें से कोई नहीं” के विकल्प को अपना मत देते हैं तो बचे हुए 10 प्रतिशत वोटों में से जो प्रत्याशी “बहुमत” पायेगा वो जीत जाएगा. होना तो ये चाहिए था कि ये मतदान ही रद्द हो जाता और दोबारा चुनाव होता. कई देशों में इस तरह की वयवस्था है.

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में उम्मीद जताई है कि इस विकल्प के बाद राजनीतिक दलों पर दबाव पड़ेगा और वे अपने प्रत्याशी चुनते हुए “जनता की इच्छा” का ध्यान रखेंगे और साफ़ सुधरी छवि वाले लोंगों को ही अपना उम्मीदवार बनायेंगे. न्यायालय का मानना हैं कि ये “नकारात्मक मतदान” धीरे धीरे भारतीय लोकतंत्र में एक व्यवस्थात्मक परिवर्तन लाएगा. हम उम्मीद करते हैं कि न्यायालय की ये आशा पूरी होगी अन्यथा आज की राजनीतिक दलों की जो स्थिति है उसे देखते हुए तो लगता नहीं कि ऐसा जल्द ही होगा.

आज जिस तरह का भाई भतीजावाद, धनबल और बाहुबल का बोलबाला राजनीतिक दलों के बीच है उससे तो एक गहरी निराशा का भाव मन में आता है. सोचिये क्या मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी, करूणानिधि की डीएमके, शरद पंवार की एनसीपी, बादल का अकाली दल, चौटाला का लोकदल, और लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल अपने परिवार के प्रत्याशियों से बाहर आ पायेगा ? कई बार कितना हास्यास्पद लगता है. इनके सब रिश्तेदार तो सांसद या विधायक है. बहू, बेटी, बेटा, पत्नी, भतीजा, भतीजी, भाई, चाचा, साला, मामा और ना जाने कौन कौन? जैसे कि इन्हें उम्मीदवार मिलते ही नहीं. इन जैसे दलों को अच्छे बुरे प्रत्याशियों से क्या लेना देना? बस प्रत्याशी होने के लिए रिश्तेदारी ज़रूरी है.

और अगर आप इनके रिश्तेदार नहीं है तो फिर आपके पास मोटा पैसा होने चाहिए. चुनाव लड़ने के लिए और पार्टी को देने के लिए भी.  किसी तरह टिकेट मिल भी गया तो करोंड़ों रुपये लगते हैं एक पार्षद के चुनाव तक में. ऐसे में कोई आम आदमी चुनाव लड़ने की सोच भी कैसे सकता है?

अगर राजनीति के अपराधीकरण की बात लें तो मौजूदा लोकसभा में ही 162 सांसद ऐसे हैं जिन पर अदालतों में आपराधिक मुकदमें चल रहे हैं. इनमें से आधे से ज्यादा पर हत्या, किडनेपिंग, दंगा भड़काने, डकैती, चोरी, धोखाधड़ी, गबन, फिरौती मांगने और रिश्वत लेने जैसे संगीन जुर्म करने के आरोप हैं. राज्य विधानसभाओं की स्थिति तो और भी बदतर है. सवाल है कि क्या ये दल और ये बाहुबली चुनाव लड़ना छोड़ देंगे? बेहतर होता कि न्यायालय ये वयवस्था भी करता कि यदि “इनमें से कोई भी नहीं” के विकल्प को किसी क्षेत्र में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले तो वो चुनाव ही रद्द हो जाएगा. इससे स्वतः ही राजनीतिक दल ऐसे नेताओं को टिकट नहीं देने के लिए मजबूर हो जाते.

फिर भी ये फैसला स्वागत योग्य है क्योंकि चुनाव सुधार की दिशा में यह एक बड़ा और सराहनीय कदम है. इसके लिए उच्चतम न्यायालय और चुनाव आयोग दोनों ही बधाई के पात्र हैं. न्यायालय इस फैसले के लिए और  जिस रफ़्तार के साथ फैसले को लागू किया गया है उसके लिए चुनाव आयोग की जितनी भी सराहना की जाए वो कम है. उम्मीद है कि अब वो लोग भी वोट करने सामने आएंगे जो मतदान के दिन ये सोच कर कर घर से बाहर नहीं निकलते थे कि किसे वोट दिया जाए. क्योंकि सभी प्रत्याशी उन्हें चोर चोर मौसेरे भाई जैसे लगते थे. अब वे गलत प्रत्याशियों को “रद्द” कर अपना रोष ज़ाहिर कर सकतें हैं.

मगर राजनीति को साफ़ करने के लिए अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है. जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आन्दोलन के समय से वापस बुलाने के अधिकार यानि “राइट टू रीकॉल”, और चुनावों की राज्य द्वारा फंडिंग जैसे कई चुनाव सुधार उपाय लंबित पड़े हुए है. सोशल मीडिया के इस युग में  लोकतंत्र को सार्थक बनाए रखने के लिए इन्हें अविलम्ब लागू करने की ज़रूरत है.  जब जनता के हाथ में इन अधिकारों की झाड़ू आ जायेगी तो देश की राजनीति में जो कूड़ा जमा हो गया है और उससे जो सडांध और बदबू निकल रही है उसे साफ़ करना मुश्किल नहीं होगा.

उमेश उपाध्याय
7 अक्तूबर 2013

मौनी बाबा अब तो बोलो !

प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह अब क्या करेंगे? अपने पद, मंत्रिमंडल और सरकार की प्रतिष्ठा बचाते हुए इस्तीफ़ा देंगे? गांधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा भारतीय संविधान की गरिमा और पद के सम्मान से उपर नहीं हो सकती. सवाल सिर्फ़ उनके व्यक्तिगत सम्मान का ही नहीं. प्रधान मंत्री और मंत्रिमंडल की सार्वजनिक प्रताडना, भर्त्सना और अपमान किसी भी पार्टी का अंदरूनी मामला नहीं हो सकता.



प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह अब क्या करेंगे? अपने पद, मंत्रिमंडल और सरकार की प्रतिष्ठा बचाते हुए इस्तीफ़ा देंगे या फिर ”परिवार” के प्रति अपनी “अटूट आस्था” का निर्वाह करते हुए एक बार फिर खून का घूँट पी कर रह जायेंगे ? कोंग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने सार्वजनिक रूप से सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश की भर्त्सना कर और उसे “बकवास” बता कर एक अजीब सा संकट पैदा कर दिया है . जैसा कि राहुल गाँधी ने कहा कि “उन्हें इस बात से मतलब नहीं कि विपक्षी नेता क्या कह रहे हैं, उन्हें मतलब सिर्फ़ इस बात से है कि कोंग्रेस पार्टी क्या कर रही है.” पर क्या सवाल सिर्फ़ इतना सीधा है ? मंत्रिमंडल द्वारा पारित किया गया अध्यादेश जो कि राष्ट्रपति के पास भेज दिया गया हो कोंग्रेस पार्टी का अंदरूनी मामला नहीं है. वह एक आधिकारिक और सरकारी दस्तावेज़ है जिस पर पूरे मंत्रिमंडल की मोहर लगी है.

क्या ये संभव है कि पार्टी में बहस हुए बिना ये मंत्रिमंडल ने पारित किया हो? तो फिर जब पार्टी में इस पर बहस हुई तो राहुल और कोंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने इसे क्यों नहीं रोका ? ये कोई ऐसा मुद्दा नहीं था जो गुपचुप कर लिया गया हो. उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद पूरे देश में और  मीडिया में इस पर चर्चा हो रही थी. संसद में भी इस पर बहस हुई थी. तब राहुल चुप क्यों रहे? इसीलिये सवाल इस अध्यादेश के सही और गलत होने का भी नहीं है. साफ़ है कि राहुल गांधी का नाटकीय बयान उनकी बाद की सोच है?

कोंग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को पूरा अधिकार है कि वे अपनी नीतियों, सोच और फैसलों में कितने ही बदलाव करें. परन्तु प्रधान मंत्री और मंत्रिमंडल की सार्वजनिक प्रताडना, भर्त्सना और अपमान किसी भी पार्टी का अंदरूनी मामला नहीं हो सकता. राहुल गांधी भूल गए कि डा मनमोहन सिंह कोई कोंग्रेस के नहीं पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं. उन्होंने देश के इस सबसे बड़े पद की मर्यादा बनाए रखने की शपथ ली है. गांधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा भारतीय संविधान की गरिमा और पद के सम्मान से उपर नहीं हो सकती. सवाल सिर्फ़ उनके व्यक्तिगत सम्मान का ही नहीं बल्कि उच्च  सांविधानिक पद की मर्यादा, राजनीतिक औचित्य और लोकतान्त्रिक मूल्यों का है.
राहुल गांधी शायद नहीं जानते कि उन्होंने शुक्रवार की दोपहर प्रेस क्लब में हो रही अजय माकन की प्रेस कोंफ्रेंस में तीन मिनट में क्या कर दिया है? अगर वो इसकी गंभीरता समझ पाते तो निश्चित ही ऐसा नहीं करते. उन्होंने न सिर्फ़ देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल और प्रधानमन्त्री के पद को असाधारण नुकसान पहुँचाया है बल्कि अपने परिवार की विरासत, अपनी राजनीतिक समझ और लोकतान्त्रिक मर्यादा को दीर्घकालिक क्षति पहुंचाई है.

डा मनमोहन सिंह की राजनीतिक कार्यशैली, नीतिओं, आर्थिक सोच, दूसरे कार्यकाल में उनकी अकर्मण्यता और निर्णयहीनता की आप कितनी ही आलोचना करें उनकी सज्जनता और भलमनसाहत पर उंगली उठाना मुश्किल है. वे राहुल गांधी द्वारा इन शब्दों में सार्वजनिक निंदा के पात्र कदापि नहीं थे. उनके नज़दीकी लोग जानते हैं कि कई मौकों पर वे अपने निजी आग्रहों को छोड़कर पार्टी और परिवार के फैसलों पर अमल करते रहे हैं पर शुक्रवार का “फाड कर फैंक देने के लायक” और “पूरी तरह बकवास” प्रकरण संभवतः उनकी उस अंतरात्मा को भी झिंझोड दे जो उन्होंने “परिवार” के प्रति कृतज्ञता और एक “रहस्यमयी” कर्तव्यनिष्ठा को गिरवी रख छोड़ी है.

सबकी नज़रें अब डा मनमोहन सिंह पर रहेंगी कि वे अभी भी इन निजी निष्ठाओं के गुलाम रहकर कुछ और महीनों के लिए ऐसे प्रधानमंत्री बनकर रहना चाहेंगे जो इस तरह लताड़ा गया हो या फिर अपनी और अपने मंत्रिमंडलीय साथियों के पद और गरिमा की रक्षा करते हुए इस्तीफ़ा देने का साहस दिखायेंगे चाहे फिर नवंबर में चार राज्यों के साथ ही लोकसभा के चुनाव कराने की तोहमत उनके सर क्यों न पड़े. अगर वे ऐसा कर पाए तो वे फिर कुछ मात्रा में ही सही वे उस सम्मान को प्राप्त कर पायेंगे जो अपने इस दूसरे कार्यकाल में उन्होंने खोया है. अन्यथा एक कमज़ोर, शक्तिहीन और बिना रीढ़ के भारतीय प्रधानमंत्री की उनकी छवि इतिहास के पन्नों में सदा के लिए दर्ज हो जायेगी.  इस स्थिति के लिए जब वे राहुल गांधी से ज्यादा ज़िम्मेदार ठहराएं जायें तो फिर उन्हें आपत्ति नहीं होनी चाहिए.


उमेश उपाध्याय
28 सितम्बर 2013  

राजनीतिक दल : सैयाँ भये कोतवाल

पक्ष हो या विपक्ष हमाम में सब नंगे हैं.पार्टियां भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के विरोध में लिए कितनी ही बड़ी बड़ी बातें क्यों न करें असल में कुछ करना नहीं चाहतीं, और जब सुप्रीम कोर्ट कुछ करता हैं तो ये कानून ही बदल देतीं हैं. 


संसद में सारे राजनीतिक दल किसी मुद्दे पर एक हों ऐसा नज़ारा कम ही दिखाई देता है. अक्सर ज़रा सी बात पर ये दल तलवार खींचे रहते हैं. अक्सर कोफ़्त होती है कि राष्ट्रीय हित पर ये एक क्यों नहीं होते? मगर आश्चर्य ! पिछले सत्र में ये एक बार नहीं तीन तीन बार सारी पार्टियां एक हुईं. मगर अफ़सोस, मुद्दे राष्ट्रीय हित के नहीं बल्कि पार्टी हित के थे. इन तीनों ही ख़बरों पर लोगों का उतना ध्यान नहीं गया जितना जाना चाहिए था. वे मुद्दे जिन पर सारे राजनीतिक दल संसद में एक हो गए थे - एक, उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के तरीके में बदलाव का विधेयक, दूसरा, राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने का विधेयक और तीसरा जेल गए जनप्रतिनिधियों से चुनाव लड़ने का अधिकार छीनने वाले उच्चतम न्यायालय के फैसले को उलटने वाला विधेयक. ये तीनों ही मुद्दे सार्वजनिक जीवन में शुचिता, नैतिकता और पारदर्शिता से जुड़े हुए हैं. लेकिन राजनीतिक दलों ने इसका उल्टा ही किया.

सबसे पहले बात करते हैं उच्चतम न्यायालय के जुलाई महीने के उस फैसले की जिसके तहत उसने ऐसे नेताओं को चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया था जो जेल में बंद हैं. अभी तक ऐसे नेता इस बहाने जेल से भी चुनाव लड़ते रहे हैं कि उनका मामला बड़ी अदालत में लंबित है. और जैसा कि होता रहा है ये मामले निचली अदालत से उच्च न्यायालय और फिर वहाँ से उच्चतम न्यायालय जाते हैं. यानि फैसला होने में बरसों बीत जाते हैं और ऐसे नेता चुनाव लड़ते रहते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ साफ कहा कि आप जेल से चुनाव नहीं लड़ सकते. ये एक ऐसा फैसला था जिससे राजनीति के अपराधीकरण को समाप्त करने में मदद मिलती.

मगर राजनीतिक दलों की जल्दबाजी तो देखिये 6 सितम्बर को सिर्फ़ 15 मिनट में लोकसभा में बिना किसी बहस के जन प्रातिनिधि कानून में संशोधन कर दिया गया और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को बदल दिया गया. लोकसभा में ऐसी एकता पहले नहीं देखी गई थी. कहाँ कोयला घोटाले में संसद में जूतमपजार हो रही थी कहाँ सब अपने जेलबंद साथियों को बचाने सब एक हो गए?
दूसरा मसला था सूचना के अधिकार के कानून से राजनीतिक दलों को बाहर रखने का. पिछले महीने संसद में सूचना के अधिकार के दायरे से राजनीतिक दलों को बाहर रखने के लिए कानून मे बदलाव का बिल लोकसभा में सरकार ने रखा. इसका तृणमूल कोंग्रेस को छोडकर सारे दलों ने समर्थन किया. राजनीतिक दलों का कहना है कि अगर वे आरटीआई के दायरे में आये तो बहुत सी “गोपनीय” सूचना उन्हें जनता को देनी पड़ेगी. है न कमाल की बात? जनता के “चंदे” से चलने वाले दल जनता को सूचना देने से डरते हैं?

इसका बड़ा कारण है. राजनीतिक दलों के पास छुपाने को बहुत कुछ है. इसके लिए एक ही उदाहरण काफी होगा. एक अध्ययन के मुताबिक़ 2004-05 से 2010-11 के बीच अगर पार्टियों के आयकर रिटर्न को देखा जाए तो 6 बड़े राजनीतिक दलों को 4895 करोड रुपये का चन्दा मिला. इसमें से 3674 करोड यानि 75 % पैसा अज्ञात स्रोतों से आया. ये दल हैं कोंग्रेस, बीजेपी, सीपीआई, सीपीएम, बीएसपी ओर एनसीपी.  जाहिर है कि अगर आरटीआई के तहत अगर इन पार्टिओं को ये बताना पडा कि ये अग्यात स्रोत क्या हैं तो इन दलों की तो नानी ही मर जायेगी. इसलिए सब दल साथ आये कानून को बदलने के लिए. यानि जनता को ये जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि हमारे दलों को कौन पैसा देता है?

जिस तीसरे मुद्दे पर सारे दल एक हुए हैं वो है सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति.अब तक ये नियुक्ति एक कोलेजिअम सिस्टम के तहत सुप्रीम कोर्ट ही करता रहा है. अब सरकार चाहती है कि जजों की नियुक्ति में उसका भी हाथ हो सो सरकार इसके लिए नया क़ानून लाना चाहती है. इस पर भी सारे दल एक साथ आ गए है.

इन तीनों ही मामलों में एक बात साफ़ हैं कि ये पार्टियां भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के विरोध में लिए कितनी ही बड़ी बड़ी बातें क्यों न करें असल में कुछ करना नहीं चाहतीं, और जब सुप्रीम कोर्ट कुछ करता हैं तो ये कानून ही बदल देतीं हैं.और तो और अब इन्होने ठान लिया हैं कि ये जजों की नियुक्ति भी खुद ही करेंगे ताकि अदालतें ऐसे फैसले ही न दे पायें जिनसे नेताओं के हितों को चोट पहुँचती हो. वाह रे लोकतंत्र ! अब चोर ही कोतवाल हुआ जाता है.

इन तीनों ही मुद्दों से ये बिलकुल स्पष्ट हो गया कि चाहे वो पक्ष हो या विपक्ष सब एक हैं. हमाम में सब नंगे हैं. जनता को एक ही सन्देश नेताओं और दलों ने मिलकर दिया है जब हमारे हितों की बात आयेगी हम एक होंगे. केस भी हमारा होगा और फैसला भी हम करेंगे. सुप्रीम कोर्ट कुछ भी फैसला दे, जनता कुछ भी कहे हमें लोकलाज का कोई डर नहीं. सच ही है जब सैयाँ भये कोतवाल तो डर कहे का ?

उमेश उपाध्याय
25 सितम्बर 2013

Saturday, September 14, 2013

#Modi Vs Rahul मोदी घोषणा और कोंग्रेस की “पारिवारिक” मजबूरी

बीजेपी ने अपना तुरुप का इक्का चल दिया है. मगर कोंग्रेस क्या कहेगी? क्या ये, कि अगर पूर्ण बहुमत हुआ तो राहुल गांधी, नहीं तो फिर कोई राजनीतिक “चरण पादुका” ? कभी पार्टी का संबल होने वाला गांधी परिवार ही अब उसकी सीमा बनता दिखाई दे रहा है.राहुल गांधी की अदृश्यता और सोनिया की रहस्यमयी चुप्पी ये दोनों ही पार्टी को एक अनजाने खोल के अंदर रहने को मजबूर कर रहे हैं. 



बीजेपी ने अपना तुरुप का इक्का चल दिया है. गेंद अब कोंग्रेस के पाले में हैं कि वो क्या करेगी? क्या  राहुल अपने खोल से बाहर आकर इस खुली चुनौती को स्वीकार करेंगे? क्या तीसरी बार मनमोहन ही उसका चेहरा होंगे? या फिर 2014 तक राहुल गाँधी को लेकर “हैं भी और नहीं भी” का मौजूदा  सिलसिला जारी रहेगा? बीजेपी ने प्रधानमंत्री के लिए नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा करके कोंग्रेस की इन दिक्कतों को खासा बढ़ा दिया है. कोंग्रेस की सबसे बड़ी समस्या ये है कि वो राहुल का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित कर नहीं पा रही. क्योंकि ऐसा करना आज उसके लिए बेहद राजनीतिक जोखिम से भरा है. राहुल के खाते में ऐसी कोई राजनीतिक, प्रशासनिक अथवा राष्ट्रीय उपलब्धि नहीं है जिसे पार्टी जनता के सामने ले जा कर चुनावो में भुना सके.

और किसी का नाम लेने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि कोंग्रेस में शीर्ष पद सिर्फ़ गाँधी परिवार का सदस्य ही ले सकता है. परिवार का सदस्य किसी भी कारण से यदि पद लेने की स्तिथि में न हो तो परिवार ऐसे व्यक्ति को चुनता है जिसका जनाधार न हो. पद देने के बाद भी ऐसे व्यक्ति को पदनाम तो मिल जाता है पर पद की सत्ता और ताकत नहीं. मौजूदा प्रधान मंत्री डा मनमोहन सिंह इसके उदाहरण हैं. प्रधानमंत्री तो वे तकरीबन नौ साल से हैं पर सब जानते हैं कि असली ताकत और सत्ता  सोनिया और राहुल के हाथ में हैं. तो  आज यूपीए की नाकामियों का ठीकरा  फूट रहा है तो वो प्रधान मंत्री के सर पर और अगर कुछ भी उपलब्धि होती तो वो गाँधी  परिवार के नाम. यानि मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू.

परिवार की ये स्थिति आज कोंग्रेस की सबसे बड़ी मजबूरी है. ये नहीं कि कोंग्रेस में नेता नहीं हैं. कई मुख्यमंत्री हैं जो कोंग्रेस को एक से ज्यादा बार जिता चुके है. कई केंद्रीय मंत्री भी हैं जिनमे क़ाबलियत है. मगर इनमें से कोई भी कोंग्रेस में प्रधानमंत्री पद की ख्वाहिश तो क्या सपने में भी ऐसा सोच नहीं सकता. यानि नीचे से उठकर कोई कितनी भी क्षमता दिखादे एक समय बाद उसके लिये फुल स्टॉप ही है.

बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के अनुसार 2014 में मोदी के नेतृत्व में उनकी पार्टी की सरकार बनेगी. ये बात सही होती है कि नहीं ये बाद में मालूम पडेगा. मगर ये सही है कि इससे पार्टी के कार्यकर्ता एक निश्चयात्मक स्वर में वोट तो माँग सकेंगे. मगर कोंग्रेस क्या कहेगी? क्या ये, कि अगर पूर्ण बहुमत हुआ तो राहुल गांधी, नहीं तो फिर कोई राजनीतिक “चरण पादुका” ?  दरअसल जो परिवार और विरासत उसकी बड़ी ताकत रही है वही आज उसकी बड़ी राजनीतिक कमजोरी बन गई है. कभी पार्टी का संबल होने वाला गांधी परिवार अब उसकी सीमा बनता दिखाई दे रहा है.

ये सब जानते हैं कि मोदी को लेकर बीजेपी में राजनीतिक उठा पटक, सियासी दांवपेंच, मान मनव्वल और शह मात का खेल गोवा की बैठक के बाद से ही चल रहा है. और ये शायद आगे भी चले. पार्टी के बड़े नेता और पूर्व उपप्रधान मंत्री लाल कृष्ण आडवानी ने तो राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी भी ज़ाहिर कर दी है. मगर एक राजनीतिक दल में खुलकर राजनीति होना ऐसा बुरा भी नहीं और एक तरह से प्रजातान्त्रिकता की निशानी है बशर्ते कि वो सियासी दंगल में न बदल जाए. पर कोंग्रेस में क्या ऐसा हो सकता है? पार्टी कार्यकर्ता तो दूर कोंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से कोई पत्रकार तक नहीं पूँछ सकता कि वे २०१४ के चुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उमीदवार के बारे में क्या सोचतीं हैं. वे तो किसी को उपलब्ध ही नहीं है.

राहुल गांधी की अदृश्यता और सोनिया की रहस्यमयी चुप्पी ये दोनों ही पार्टी को एक अनजाने खोल के अंदर रहने को मजबूर कर रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए रणभेरी बज चुकी है. एक तरफ का सेनापति कमर कस कर अपनी सेना को हुंकार रहा है मगर दूसरी और मालूम ही नहीं कि सेनापति कौन है और राजा अपने किले के भीतर गहरी खामोशी में है. एक समय ये खामोशी सोनिया गाँधी का एक ताकतवर हथियार था मगर शायद आज नहीं. ट्विटर और फेसबुक के इस युग में जब टेलिविजन भी प्राचीन दिखाई देता है ऐसी चुप्पी राजनीतिक रूप से आत्मघाती हो सकती है.

उमेश उपाध्याय
13 सितम्बर 2013

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Friday, September 13, 2013

भारतीय अर्थव्यवस्था : एक सपने की मौत

सरकार ने अर्थव्यवस्था के मर्ज़ को ठीक करने के लिए लगातार  ऐसी खिचड़ी परोसी है कि मरीज़ और बीमार होता गया है. हालत ये है कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था आईसीयू में वेंटिलेटर पर पहुँच गई है. सोचिये आज देश के सोने को बेचने की बात हो रही है? इस सरकार ने उस सपने को पूरी तरह तोड़ दिया है जो ये देश कुछ समय पूर्व देख रहा था.



खबर है कि मुंबई के आस पास के समुद्र तटों पर दशकों बाद एक बार फिर सोने के तस्कर सक्रिय हो गए हैं. वहाँ सोने की तस्करी फिर से शुरू हो गई है. ये नतीजा है सरकार की उन ताज़ा नीतियों का जो उसने सोने का वैध और कानूनी आयात रोकने के लिए लागू की हैं. लोंगों को एक बार हिंदी फिल्मों के “राबर्ट” “बॉस”, “सोना” और “मोना”  के  दृश्य याद आने लगे हैं. सवाल है कि क्या हम फिर से अभावों, मंदी, कंट्रोल और लाइसेंस के युग में जा रहे हैं.

आइये, कुछ ताज़ा आंकड़े देखते हैं. अगस्त के महीने में देश में औद्योगिक गतिविधि में तेज़ी से गिरावट हुई है. मार्च २००९ के बाद पहली बार भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसा हुआ है. अप्रेल से जून के बीच विकास की दर 4.4 फीसदी रही है. रुपया गिर रहा है, महँगाई सुरसा की तरह बढ़ रही है, नौकरियां घट रहीं हैं और काम के बाज़ार में नए आने वाले युवा भारतीयों की संख्या में बेतहाशा बढोत्तरी हो रही है. देश एक विकट और भयावह आर्थिक स्थिति में फंसा है और सबसे कष्टप्रद बात है कि देश को चलाने वालों के पास किसी सवाल का संतोषजनक उत्तर नहीं है.

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली रात को पेट्रोल पम्प बंद करने का हास्यास्पद सुझाव दे रहे हैं तो प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह विपक्षी दल भाजपा को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. कोई अंतर्राष्ट्रीय हालातों को इसका ज़िम्मेदार बता रहा है तो चालू खाते  का घाटा कम करने के लिए वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने तो देश के सोने के भण्डार को ही तकरीबन बेचने की सलाह दे डाली. हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि वे तो सोने के मौद्रिकीकरण (monetising) की बात कह रहे थे ना कि उसे गिरवी रखने की. ये बात अलग है कि उन्होंने ये नहीं समझाया कि मौद्रिकीकरण से उनका आशय क्या था !

आर्थिक विशेषज्ञ और विश्लेषक इसका आकलन कर रहे हैं कि यूपीए सरकार ने ऐसा क्या किया (या क्या नहीं किया) जिससे ऐसे हालत पैदा हुए. बहुत संक्षेप में कहा जाए तो नीतिगत किंकर्तव्यविमूढता (Policy Paralysis), चुनावी मानसिकता और भ्रष्टाचार इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा ज़िम्मेदार है कोंग्रेस में शीर्षतम स्तर पर फ़ैली वैचारिक भ्रम और नीतिगत अस्पष्टता की स्थिति. प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री जहाँ विकास के घोड़े का मुहँ विश्व बैंक निर्देशित घोर उदारीकरण की तरफ करना चाहते हैं वहीं सोनिया गाँधी देश को सत्तर के दशक के समाजवादी युग में ले जाना चाहती हैं. इसलिए एक तरफ खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों को खुली छूट की वकालत होती है तो दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा बिल आता है. ये तो मात्र एक उदाहरण हैं. बुनियादी ढाँचे में निवेश, कृषि, भूमि अधिग्रहण, शिक्षा, निर्यात, मेन्यूफेक्चरिंग, छोटे उद्योग और बैंकिंग - तकरीबन हर क्षेत्र में नीतिगत असमंजसता की ऐसी स्थिति बनी हुई है. नतीजा हैं कि मौजूदा सरकार ने अर्थव्यवस्था के मर्ज़ को ठीक करने के लिए लगातार  ऐसी खिचड़ी परोसी है कि मरीज़ और बीमार होता गया है. हालत ये है कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था आईसीयू में वेंटिलेटर पर पहुँच गई है.

याद कीजिये कि किस तरह कुछ ही बरस पहले तकरीबन हर बहस में में ये चर्चा होती थी कि हम चीन के बराबर कब पहुंचेंगे ! 9 प्रतिशत के आसपास की विकास दर का आंकड़ा देखकर हम सोचते थे कि कैसे इसे दो अंकों का बनायें ? जबभी भारत के आर्थिक शक्ति बनने का ज़िक्र होता था दिल में कैसी हर्ष देने वाली हिलोर उठती थी ! हर भारतीय देश को एक विकसित देश बनने का अरमान दिल में संजोये हुए है, ऐसा होने की कल्पना मात्र से वो सिहर उठता था. मगर सोचिये आज देश के सोने को बेचने की बात हो रही है? कहाँ से कहाँ आ पहुंचे हम? इस सरकार ने उस सपने को पूरी तरह तोड़ दिया है जो ये देश कुछ समय पूर्व न सिर्फ़ देख रहा था बल्कि पूरे आत्मविश्वास और यकीन के साथ उसे साकार करने में जुटा था.

विकास दर उपर नीचे होना, रूपये की दर में कमबढ़त, महंगाई, जिंसों के दाम घटना बढ़ना, शेयर बाज़ार में ऊँचनीच – ये सब होता रहता है. मगर देश के समूचे आर्थिक भविष्य को लेकर ही आम लोगों में अनिश्चितता हो जाये ये खतरनाक है. इसलिए अगर सबसे बड़ा पाप हुआ है तो वो है उस सपने का टूट जाना जो हम सब देख रहे थे. इसकी सज़ा जिसे मिलनी है वो तो मिलेगी ही मगर देश को ये भारी पडा है और ना जाने कितनी पीढ़ियों को इसका बोझ उठाना पड़ेगा !

उमेश उपाध्याय
3  सितम्बर  2013

Friday, September 6, 2013

#Politics of Appeasement ये कैसा सेकुलरवाद !

मस्जिद में काम कर रहे इमाम और मुअज्ज़िन गरीब और ज़रूरतमंद हैं तो फिर मुख्यमंत्री होने के नाते उन्होंने मंदिरों के पुजारियों, गिरजाघरों के पादरियों, बौद्ध मठों के भिक्षुओं और गुरुद्वारों के ग्रंथियों आदि के बारे में ऐसा क्यों नहीं सोचा? कोलकता उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सरकार के निर्णय को गैरकानूनी बताते हुए इसे निरस्त कर दिया. उन्होंने इसे असंवैधानिक और जनहित के विरुद्ध करार दिया.

  
कोलकता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार के उस फैसले को संविधान के विरुद्ध करार दिया है जिसमें सरकार मस्जिदों के इमाम और मुअज्जिनों को हर महीने सरकारी खजाने से भत्ता दे रही थी. ममता सरकार ने अप्रेल 2012 से हर इमाम और मुअज्ज़िन को 2500 और 1500 रूपये भत्ता देना शुरू किया था. उस समय विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया था मगर सरकार ने इसे लागू कर दिया था. फैसले के खिलाफ चार जनहित याचिकाएं कोलकता उच्च न्यायालय में दायर की गयीं थीं, इनमें से एक राज्य भाजपा के महामंत्री असीम सरकार की याचिका भी थी.

एक सितम्बर के अपने फैसले में न्यायमूर्ति पी के चट्टोपाध्याय और न्यायमूर्ति एम पी श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सरकार के निर्णय को गैरकानूनी बताते हुए इसे निरस्त कर दिया. उन्होंने इसे असंवैधानिक और जनहित के विरुद्ध करार दिया. न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि ये भत्ता भारतीय संविधान की धारा 14 और 15/1 का उल्लंघन करता है. इन धाराओं के मुताबिक राज्य नागरिक के धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर उनमें भेदभाव नहीं कर सकता. इस भत्ते पर राज्य सरकार सालाना तकरीबन 126 करोड रुपये खर्च कर रही थी.

उच्च न्यायालय का फैसला कानून के अनुसार ही है क्योंकि मस्जिद या मंदिर चलाने की जिम्मेदारी उनकी है जो उसमें इबादत या पूजा करते हैं. सरकार किसी एक मज़हब के धर्मस्थान चलाने के लिए जनता का पैसा नहीं खर्च कर सकती. मगर सवाल ये है कि क्या ममता बनर्जी, उनके सलाहकारों और अधिकारिओं  को क्या ये मालूम नहीं था? उन्हें ये ज़रूर मालूम रहा होगा कि ये फैसला न्यायालय में नहीं टिकेगा फिर भी उन्होंने ऐसा किया. इसके पीछे की मानसिकता क्या है? और ऐसा सभी अल्पसंख्यकों के लिए नहीं बल्कि मुसलमानों के लिए ही क्यों किया गया? क्योंकि पश्चिम बंगाल में  तृणमूल पार्टी को उनके वोट चाहिए?

ये सही है कि लोकतंत्र में हर पार्टी वोट की तलाश में रहती है मगर लोकतंत्र की मर्यादाएं भी तो हैं. ये मर्यादाएं खींची है भारतीय संविधान ने. और इसके अनुसार मज़हब के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता. तो फिर किस चिंता के तहत ममता बनर्जी ने ऐसा किया ? अगर उन्हें ये चिंता थी कि मस्जिद में काम कर रहे इमाम और मुअज्ज़िन गरीब और ज़रूरतमंद हैं तो फिर मुख्यमंत्री होने के नाते उन्होंने मंदिरों के पुजारियों, गिरजाघरों के पादरियों, बौद्ध मठों के भिक्षुओं और गुरुद्वारों के ग्रंथियों आदि के बारे में ऐसा प्रावधान करने के बारे में क्यों नहीं सोचा?

बेहतर होता कि वे इन लोगों की शिक्षा और तरक्की के लिए कोई योजना बनातीं. उन्होंने तो भत्ते का टोकन देकर सिर्फ़ अपने को “बड़ा सेकुलरवादी” दिखाने का प्रयास किया. दिक्कत ये है कि अल्पसंख्यकों की भी कोई वास्तविक चिंता करने की न तो मानसिकता है ना ही ऐसा कोई मकसद था इस कदम के पीछे. देखा जाए तो अल्पसंख्यकों की चिंताएं भी रोजी-रोटी, कामधंधा, शिक्षा और तरक्की  है. उन्हें सिर्फ़ भावनात्मक और मजहबी मामलों में उलझा कर वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करने की राजनीति उनकी और देश की तरक्की में आड़े आ रही है. ये बहुत खतरनाक भी है. पड़ोसी देश पाकिस्तान में हम ये देख ही रहे हैं.

ये सिर्फ़ ममता कर रहीं हैं ऐसा नहीं है. सच्चर आयोग के गठन से लेकर रंगनाथ मिश्र आयोग और मुसलमानों के लिए आरक्षण की वकालत, उत्तर प्रदेश में आईऐएस  दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन आदि लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं जहाँ पार्टियां अपने को दूसरे से अधिक सेकुलर दिखाने की होड में घोर साम्प्रदायिक काम कर रहीं हैं. इस प्रतियोगी सेकुलरवाद में पार्टियां और नेता इतने आगे चले गए हैं कि घोर देशद्रोही और आतंकवादी कार्यवाहियों को भी इसी चश्मे से देखने की कोशिश हो रही है. कोइ इशरत जहान को अपने राज्य की बेटी बताता है, कोई संसद पर हमले के दोषी अफजल की फांसी का विरोध करता है तो कोई बटाला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताता है.

इनसे पूंछा जाना चाहिए कि अल्पसंख्यकों की ये ठेकेदारी उन्हें किसने दी है? क्या ये अल्पसंख्यकों का भी अपमान नहीं? शायद इस राजनीतिक जमात को ज़रूरत है कि देश का संविधान एक बार फिर ठीक से पढ़ें और हर हिन्दुस्तानी को हिन्दुस्तानी की तरह देखें ना कि एक वोट बैंक की तरह. कोलकता उच्च न्यायालय के इस फैसले ने एक बार सबको यही याद दिलाया है.

उमेश उपाध्याय 
4 सितम्बर 2013